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Women’s day 2021: मुसीबत को जिसने बना ली अपनी ताकत, हर दर्द को जहर की तरह पिया और गरीबी की कलम से लिखी अपने हौसलों की इब़ारत, पढ़िए रायगढ़ की इस वेजिटेबल लेडी के फर्श से अर्श तक पहुंचने की दास्तां…

रायगढ़ मुनादी || तू डर मत, तू रूक मत, तू है निर्भीक, तू है निडर। तुझमें है दुर्गा तुझमें है काली… फिर तुझे किस बात का है डर। इतिहास गवाह है कि रामायण काल की सीता से लेकर 19वीं सदी की रानी लक्ष्मीबाई तक और आज की मैरीकॉम और सायना नेहवाल तक, महिलाओं ने अपना लोहा मनवाया है। महिलाएं किसी भी मामले में पुरुषों से कम नहीं हैं।

मुसीबतों से बुलंद हुआ हौसला

लेकिन जब भी किसी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, तो इंसान अंदर से कमजोर पड़ जाता है। उसकी इच्छाशक्ति जवाब दे जाती है। आर्थिक परेशानी, सामाजिक प्रताड़ना और घरेलू हिंसा, इन तीनों का एक साथ सामना करना पड़े, तो व्यक्ति अंदर से ही पूरी तरह से टूट जाता है और वो खुद को ही खत्म करने के लिए आतुर हो जाता है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी लड़की की कहानी बताने जा रहे हैं। जिसे मुसीबतों ने ही पहाड़ जैसा मजबूत बना कर खड़ा कर दिया। अब वह आसपास के लोगों के लिए एक ऐसी नजीर बन गई है जिसकी आज हर कोई तारीफ कर रहा है।

यह यह दर्द भरी कहानी है रायगढ़ शहर के छोटे से अत्तरमुड़ा गांव की रहने वाली चंद्रिका की। जिसकी शादी घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने की वजह से काफी कम उम्र में कर दी गई। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में पेन और कॉपी होता है, उस उम्र में चंद्रिका को चूल्हा- चौका थमा दिया गया। लेकिन फिर भी इस मासूम बच्ची से इसे ही अपनी नियति मानकर कबूल कर लिया।

गरीब होना उसमें भी औरत होना बेहद दर्दनाक

आंखों में कई सपने संजोए जब चंद्रिका अपने ससुराल पहुंची, तब उसके सारे भ्रम चूर-चूर हो गए। जिस बेलन से अपने ससुराल वालों के लिए खाना बनाया करती थी। उसी बेलन से अब उसकी पिटाई होनी शुरू हो गई। ससुराल वालों ने आर्थिक, मानसिक और शारीरिक तीनों रूप से चंद्रिका को तोड़ कर रख दिया गया। तब उसे यह अहसास होने लगा कि गरीब होना और उस पर औरत होना कितना दर्दनाक है।

काफी कम पढ़ी-लिखी होने की वजह से चंद्रिका घरेलू महिला बन कर रह गई। वह अपने पति की मार सहती रही, क्योंकि उसके पास अपने मायके वापस लौट जाने का भी कोई विकल्प नहीं बचा था। हद तो तब हो गई जब उसका पति उसे जानवरों से भी बेरहमी से पीटने लगा। वह उसे सलाखों और चिमटों से दागा करता था।

एक बार को जगी चंद्रिका के मन में आस

दर्द की इंतहा पार कर चुकी चंद्रिका अब पूरी तरह से थक चुकी थी। जैसे -तैसे करके उसके दिन गुजर रहे थे कि अचानक उसे पता चला कि वह प्रेग्नेंट है। ऐसे में उसे लगा कि शायद बच्चे को देखकर ही उसके पति का दिल पिघल जाए और उसकी हालात सुधर जाए। जैसे तैसे करके चंद्रिका ने अपने पापा तक यह बात पहुंचाई की वह मां बनने वाली है।

चंद्रिका के पापा जैसे ही उसके ससुराल पहुंचे, उसने मायके जाने को जिद पकड़ ली। इसके बाद चंद्रिका के पापा उससे अपने घर ले गए और कहा कि डिलीवरी के बाद वो उसे वापस से ससुराल छोड़ जायेंगे।

बच्चे को देखकर भी नहीं पसीजा पिता का दिल

कुछ महीने बीते और आखिरकार वह दिन आया, जिसका चंद्रिका और उसके परिवार वालों को बेसब्री से इंतजार था। चंद्रिका के घर एक मासूम सी नन्हीं बेटी पैदा हुई। जहां एक और सभी बेटी के आने की खुशी मना रहे थे वहीं दूसरी ओर पूरा परिवार तब सदमे में चला गया, जब चंद्रिका के पति ने उसे ले जाने से इंकार कर दिया। उसके पति ने कहा कि उसे बेटी पैदा हुई है, इसलिए अब वह उसे नहीं अपनाएगा। चंद्रिका को छोड़कर उसका पति चला गया।

चंद्रिका की पहले से ही दो छोटी बहनें भी थी। ऐसे में अब एक वो और उसकी बेटी अपने मायके में ही बोझ बनने लगे। घर में पैसों की तंगी बढ़ती जा रही थी। चंद्रिका को ऐसे में खुद भी आगे बढ़ना था और अपने परिवार का सहारा बनना था, पर उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए ।

हालातों को हराकर फिर खड़ी हुई रायगढ़ की बेटी

ऐसे में चंद्रिका ने बहुत सोच विचार कर निर्णय लिया कि अब कुछ करके ही दिखाना है समाज को। चाहे कितनी भी मेहनत करनी पड़े। घरेलू हिंसा ने हालांकि उसे शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया था, लेकिन उसने हिम्मत जुटाई और एक छोटी सी सब्जी की दुकान खोली। शुरुआत में काफी अड़चन आयी, क्योंकि महिला को कमजोर नज़रों से देखने वाला ये समाज तरक्की करते हुए नहीं देख पा रहा था।

यह बात तो जगजाहिर है कि जब एक महिला कोई काम करने निकलती है तो पुरुष प्रधान समाज के आंखों में खटकती है। यही चंद्रिका के साथ भी हुआ, लेकिन उसने समाज के तानों, अपमनों का जवाब अपने काम के बलबूते दिया।

10 साल बाद संवर गई चंद्रिका की जिंदगी

आज चंद्रिका को सब्जी बेचते हुए 10 साल से ज्यादा हो गए, बिना आराम किये वो लगातार काम करती जा रही है। सुबह 4 बजे उठना, मंडी जाना,  फिर दुकान लगाना और शाम को फिर घर वापस जाना उसकी दिनचर्या है। हालांकि पहले वह दया का पात्र हुआ करती थी, लेकिन आज वो ईर्ष्या का पात्र है। आज उसकी पहचान एक जुझारू और हिम्मती महिला के रूप में बन गई है।

यह बात तो तय है कि औरत अगर कुछ ठान ले तो उसे वह करने से कोई नहीं रोक सकता। एक बुलंदी हासिल करने के बाद चंद्रिका ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उसका खुद का घर है, बच्ची इंग्लिश माध्यम स्कूल में पढ़ रही है। उसने दोनों बहनों को भी पढ़ाया। जिसमे उससे छोटी बहन जॉब भी कर रही है और उसके घर चलाने में मदद भी करती है।

घर बार के साथ ही खुद को भी किया बुलंद

इतना ही नहीं चंद्रिका ने इस दौरान समाजशास्त्र से MA भी कर लिया है। वह चाहती है कि अपने बिज़नेस को और आगे बढ़ाए। कोई अच्छी सी जॉब भी मिल जाए तो ठीक है। हालांकि वह चाहती है कि उसकी बच्ची पढ़ लिखकर कुछ बन जाय। इसीलिए उसने अपनी बच्ची को एक अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिलवाया है।

जब मुनादी ने चंद्रिका से पूछा कि क्या उसे जीवन साथी की आवश्यकता महसूस होती है ? उसने कहा हां, कभी-कभी होती जरूर है। लेकिन जब तक बच्ची को उसके मुकाम तक न पहुंचा दूं, तब तक मुझे संतुष्टि नहीं होगी।

चंद्रिका कहती है जब ऐसा हो जाएगा तब मैं आत्मसंतुष्टि के साथ आसमान की ओर सर उठाकर अपनी बाहें फैलाए एक आज़ाद पंछी की तरह सुकून भरी सांस लेना चाहती हूं।

हौसलों की उड़ान को लगे पंख

चंद्रिका का मतलब होता है चंद्रमा का निकला हुआ प्रकाश, जो लोगों को रोशनी और शितलता प्रदान करती है। इसी तरह चंद्रिका ने भी कभी हार नहीं मानी। कभी खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया। हर दर्द को वो जहर की तरह पी गईं और अब आखिरकार उनके हौसले की उड़ान को पंख लग चुके हैं। एक गृहणी जो कभी घरेलू हिंसा का शिकार थी वो आज हमारे समाज की महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी है।

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