Thursday, April 25, 2019
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पूरे चुनाव भर भाजपा में चलता रहा हाई वोल्टेज ड्रामा,ऐसे में कैसे होगा “सरकार”?जशपुर में हुआ ऐसा…..पढिये पूरी कहानी

राजेश पांडेय——-

 

इस चुनाव में जितना दांव पेंच का खेल जशपुर में खेला गया शायद ही कहीं खेला गया होगा। दांव पेंच का खेल अगर पक्ष और विपक्ष में होता तो शायद इस खेल की चर्चा नही भी होती लेकिन इसका चर्चा और जिक्र करना इसलिए जरूरी हो गया क्योंकि दांव पेंच का खेल यहां अपनो के बीच चल रहा था। अपने ही अपनो को पछाड़ने में लगे थे। पछाड़ने और बचने का खेल चुनाव के आखिरी आखिरी तक लोगों को रोमांचित करता रहा । 

     जशपुर जिले का यह पहला चुनाव होगा जब भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी यहां पूरी तरह अनियंत्रित और नेतृत्वविहीन दिखा । जिस जशपुर भाजपा के अनुशासन का उदाहरण भाजपा के लोग पूरे देश मे रखते हैं उस भाजपा जशपुर के नेता और कार्यकर्ता सम्हाले नही सम्हलते दिखे । जिले के सभी 3 सीटों में यही हाल देखा गया ।पत्थलगांव हो या कुनकुरी या जशपुर तीनो जगह भाजपाई आखिरी आखिरी तक कार्यकर्ताओं को एक सूत्र में समेटने की कोशिश करते देखे गए लेकिन कार्यकर्ता तो कार्यकर्ता नेता भी अलग अलग दिखे। 

     जशपुर सीट पर ज्यादा घमासान देखा गया । यहां पहली बार ऐसा हुआ जब दो अलग अलग प्रत्याशी एक ही चेहरे को सामने रखकर चुनाव लड़ते दिखे। भाजपा और कमल के आईकॉन कहे जाने वाले स्व दिलीप सिंह जूदेव को ही भाजपा पर भुला देने के गम्भीर आरोप लगे तो भाजपा से बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले खुड़िया दीवान प्रदीप नारायण ने स्व जूदेव का स्वयं को दत्तक पुत्र बताकर उनकी तस्वीर को सामने कर दिया ।याने यहां गुटबाजी सड़क पर दिखी और चुनाव जूदेव v/s जूदेव हो गया । इसके अलावे इसी बीच भाजपा को वोट न देने दिलाने की एक ऑडियो भी वायरल हो गया जो आग में घी का काम करता दिखा । गुटबाजी की ओर भी कई तस्वीरें सामने आईं  लेकिन इन दो घटनाकर्मो को नही भुलाया जा सकता क्योंकि दोनों घटनाक्रमो के  इस चुनाव में बड़े फैक्टर साबित होने के संकेत मिल रहे हैं ।

      इधर कुनकुरी विधानसभा भला कैसे शांत रहता यहां भी अंदर और बाहर दोनो तरफ से भाजपा में गुटबाजी चली ।भाजपा का चुनाव प्रचार कर रहे छोटे बड़े नेता चुनाव के आखिरी आखिरी तक अपने कार्यकर्ताओं और नाराज नेताओ को मनाने में लगे रहे । चुनाव प्रचार करने के वक़्त में नेताओं को मनाने का सिलसिला जारी रहा । ख़बर आ रही थी कि खुद संघ के लोग यहां पार्टी से नाराज थे और कई दिनों तक प्रचार में ही नही निकले हांलाकि बाद मे संघ ने मोर्चा सम्हाल लिया लेकिन दुलदुला क्षेत्र में भाजपा के खेवनहार कहे जाने वाले संघ के वरिष्ठ नेता को मनाने में काफी वक्त लग गए । इधर भाजपा से टिकट नही मिलने से नाराज भाजपा के ही कमलेश्वर नायक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाजपा के बड़े वोट बैंक में भारी सेंधमारी करते दिखे । कुनकुरी से भाजपा समर्थित महिला पार्षद तक को पार्टी नहीं मना पायी ।

     इधर पत्थलगांव को लेकर शुरू से ही आंकलन भाजपा के पक्ष में नही आ रहे थे ।बताया जा रहा था के पत्थलगांव शहर में भाजपा प्रत्याशी शिवशंकर साय को दुबारा टिकट दिये जाने को लेकर भाजपा के शहरी नेताओं और कार्यकर्ताओं में भारी रोष था और आखिरी आखिरी तक  ये नाराज रहे ।इनके आखिरी तक नाराज रहने का सबसे बड़ा कारण यह भी रहा कि इन्हें मनाने की कोशिश भी नही की गयी याने साफ है पत्थलगांव शहर को उसी हाल पे छोड़ दिया गया । 

       कूल मिलाकर देखा जाय तो 2018 के चुनाव में परिणाम जो भी आये लेकिन यह चुनावी वर्ष भाजपा के लिए किसी इतिहास से कम नही । 

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