Monday, December 9, 2019
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लोकतंत्र के महासेनानी रहे …… राजनीति के पुरोधा माने जाने वाले ……92 वर्षीय जयदयाल बेरीवाल नहीं रहे …..

रायगढ़ मुनादी।

अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में जब पूरे देश में जनसंघीय विचारधारा ने अपना आधार तलाशना प्रारंभ कर दिया उस कालखंड में रायगढ़ अंचल में भारतीय जनसंघ को प्रतिस्थापित करने वाले ऐसे बिरले शख्स ने उस वक्त के धुरंधर सियासतदां में शुमार हो चुके स्मृतिशेष लखीराम अग्रवाल और पीके तामस्कर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दिशा संभाली थी उनमें नाम लिया जाता है जयदयाल बेरीवाल जी का। मां भारती की सेवा करने के लिए तन्मयता से समर्पित होकर भारतीय जनसंघ से जुड़कर अपने राजनीतिक हमसफर रहे स्व. लखीराम अग्रवाल और पीके तामस्कर के साथ ताजिंदगी जनसंघ और भाजपा की नींव को मजबूत करने के लिए इनको याद किया जाता रहेगा। 13 अप्रैल 1927 को जन्मे और रायगढ़ के प्रतिष्ठित कुनबे बेरीवाल परिवार में हरनामदास बेरीवाल के वंश में गोद आए जयदयाल बेरीवाल ने छात्र जीवन से ही  सामाजिक के साथ ही साथ अपनी सियासी विचारधारा को मुकम्मल करना प्रारंभ कर दिया था। युवावस्था से बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार रहे जयदयाल जी ने जनसंघ में शामिल होने से पहले उस वक्त की प्रजातांत्रिक सोशलिस्ट पार्टी से भी जुड़े रहे और उन्होंने रायगढ़ के सियासी पटल पर अपनी छवि स्थापित करनी प्रारंभ कर दी थी। छात्र राजनीति में ही युवा हस्ताक्षर के रूप में पहचान बना चुके श्री बेरीवाल ने प्रजातांत्रिक पार्टी छोड़ने से पहले जनसंघ विचारधारा को आत्मसात करने से पहले लगभग वर्षभर तक कम्युनिस्ट सोच और संगठन का भी अध्ययन किया और जनसंघ से उनकी सोच का मिलान होने पर उन्होंने अंततः जनसंघ में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में बने रहने तक केवल अपनी मातृसंस्था के लिए ही सर्वस्व न्यौछावर किया। जनसंघ से जुड़ने के बाद इन्हें साथ मिला अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर से छग बनने तक भाजपा के पितृपुरूष माने जाने वाले स्व. लखीराम अग्रवाल का। रायगढ़ में जनसंघीय विचारधारा के लिए संघर्ष करने वालों में इन दो शख्सियत की पहचान प्रमुख तौर पर रही। देश के वीभत्स राजनीतिक कालखंड इमरजेंसी के समय में तत्कालीन जनसंघ के जिला अध्यक्ष के रूप में संघर्षरत रहे जयदयाल बेरीवाल ने मीसाबंदी के रूप में 19 महीने केंद्रीय जेल रायपुर में व्यतीत किए। शासन रहा हो या फिर विपक्ष अपने ओजस्वी भाषण के लिए अमिट पहचाने जाते रहे जयदयाल बेरीवाल के न केवल अविभाजित मध्यप्रदेश के समकालीन नेताओं अपितु राष्ट्रीय नेताओं से भी उनके सुमधुर संबंध रहे। जनसंघ के बाद भाजपा की स्थापना के समय पार्टी के संस्थापक सदस्यों में गिने जाने जयदयाल बेरीवाल ने रायगढ़ के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश और छग राज्य के गठन होने के बाद भी संगठन के कई महत्वपूर्ण पदों का निर्वहन किया। छग राज्य बनने के बाद पार्टी की प्राणवायु बन चुके स्व. लखीराम अग्रवाल की इनके साथ प्रगाढ़ता इतनी वृहद थी कि स्व.लखीराम के रायगढ़ आने पर उनके गद्दी चौक स्थित साम्हर बिड़ी संस्थान की गद्दी पर घंटों समय व्यतीत करना और विचारों का साझा करना आत्मीयता का समय रहा। रायगढ़ में सियासत के पर्याय माने जाने वाले पूर्व विधायक विजय अग्रवाल के राजनीतिक गुरू रहे श्री बेरीवाल से पूर्व विधायक विजय ने सियासत का तजुर्बा हासिल किया। छात्र राजनीति से ही विजय अग्रवाल उनके सानिध्य में राजनीति का सोपान तय करते रहे। रायगढ़ में राजनीतिक योगदान के साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्वों का भी बखूबी निर्वहन किया। रायगढ़ शहर के चक्रधर गौशाला में लंबे समय तक भी इन्होंने सेवा दी। छग गठन के बाद चाहे वह विधानसभा का चुनाव रहा हो या लोकसभा का चुनाव रहा हो, सियासी परिदृश्य के अनुरूप उनकी भूमिका पार्टी मार्गदर्शक के रूप में सदैव बनी रही। ताजिंदगी भाजपा के लिए समर्पित रहे जयदयाल बेरीवाल को इसलिए भी स्मरण किया जाता रहेगा क्योंकि अपने राजनीतिक प्रभुत्व और आभामंडल के बावजूद निश्छल,बेबाक और बिना किसी सियासी दाग के उन्होंने अपनी पहचान बनाई रखी। प्रौढ़काल में भी तबीयत नासाज रहते हुए भी बिस्तर पर इलाजरत जयदयाल बेरीवाल को जब यह खबर लगी कि देशव्यापी भाजपा का सदस्यता अभियान जारी है तो उन्होंने सदस्यता ग्रहण करने की इच्छा जताई तो पार्टी की टीम ने उनके घर आकर पुनः सदस्यता ग्रहण कराई। 13 अगस्त को उनके 92 वर्षायु में निधन भाजपा के लिए एक अपूरणीय क्षति ही हुई है और संगठन पर से बुजुर्ग की छत्रछाया अब नहीं रही।

संदीप बेरीवाल
पत्रकार

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