Wednesday, June 3, 2020
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किस्सा बेसिर पैर….. सँगीत नृत्य या ललित कलाएं ईश्वर की अर्मूत प्रतीक और आत्माभिव्यक्ति के माध्यम हैं, उससे पूछो जो ………

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रायगढ़ मुनादी।


पहले हमने घुटने टेके आडिटोरियम की जगह रामलीला मैदान के लिए, महज इसीलिए ना कि समारोह की गरिमा बनी रहे लेकिन लगता है चक्रधर समारोह और विवादों का चोलीदामन सा रिश्ता है।

बात नर्तकी के पैरों मे बँधे घुँघरूओ की जिस पर भगवान गणेश जी की छाप दिख रही है। सभी धर्मावलंबियों से क्षमा मांगते हुए मेरा यह कहना है कि ऐसा यदि त्रुटिवश हो गया है तो उसकी अनदेखी कर देते और कार्यक्रम की गरिमा बरकरार रखते। मुझे विश्वास है गणपति बप्पा नाराज नही होते। किसी नर्तक या नर्तकी के लिये घुँघरू के क्या मायने होते हैं उनसे जाने। घुँघरुओं मे उनके ईश्वर होते हैं जिन्हें पहनने से पहले वे माथे से छूते हैं। उसे पहनने के बाद वे जूती चप्पल तक नहीं पहनते। घुँघरू का ही दूसरा रूप पाजेब है जिसकी पूर्नता भी घुँघरू बाँध कर होती है और स्त्रियां इसे सौभाग्य चिन्ह मान कर पहनती हैं( टखने और पन्जो के मोड पर) इस पर इतना बवाल?


सँगीत नृत्य या ललित कलाऐ ईश्वर की अर्मूत प्रतीक और आत्माभिव्यक्ति के माध्यम हैं और  आत्माएं परमात्मा का ही स्वरूप है। महाराज चक्रधर सिह विख्यात तबला वादक रहे और गणेश चतुर्थी उनका जन्मदिन रहा।यदि भूलवश भी कार्ड मे एसा कुछ छप गया तो उसे तूल देना उचित नहीं लेकिन इस पूरे मामले मे प्रशासन की लापरवाही उजागर हुई है। उन्हें समितियों के गठन की प्रक्रिया मे सावधानी बरतनी होगी खास कर तब जब धर्म जैसे सँवेदनशील मुद्दे हो।
दरअसल खेल मैदान को समारोह स्थल बना कर खिलाडिय़ों की भावनाओं को आहत किया गया वहीं आमँत्रण पत्र की छपाई ने कोढ मे खाज का काम किया है। हालांकि ये दोनों मुद्दे अनावश्यक से थे कम से कम मेरी नजरों मे।अफसरान आते जाते रहते हैं। जन प्रतिनिधि का इसमें गम्भीरता से रुचि लेने का दायित्व बनता है।
 अभी- अभी उडती खबर मिली है कि प्रशासन ने दूसरे आमँत्रण पत्र छपवाने का आश्वासन दे दिया है। इस हेतु साधुवाद।

आशा त्रिपाठी
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