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क्या हमारे संविधान पर खरी उतरती हैं राजनीतिक पार्टियां? कितने सक्षम हैं “ब्यूरोक्रेसी” के ऊपर राज करते हमारे “राजनेता”…..क्या उनका काम सिर्फ चुनाव लड़ना है???

मनीष सिंह की मुनादी ।। राजनैतिक दलों का प्रशिक्षण कैसा होना चाहिए? राजनीति का मतलब क्या है? राजनैतिक दलों को संविधान ने क्या जिम्मेदारी दी है? व्यवस्था स्थापित करने वालों के नजरिये से सोचिये। देश का संचालन करने वाली दो ताकतें होती हैं। पहली ब्यूरोक्रेसी और दूसरे पॉलिटिशियन।

ब्यूरोक्रेसी का चयन लिखित परिक्षा से होता है। समाज का, क्रीम युवा टैलेंट लेकर, उसे लाल बहादुर शास्त्री अकादमी जैसी प्रीमियर सन्स्थान में शेप किया जाता है। अकादमी में प्रबन्धन, कानून व्यवस्था, अंतराष्ट्रीय सम्बन्ध, संवैधानिक व्यवस्थाएं, बजट, रेवेन्यू, भारत का एडमिनिस्ट्रेटिव सेटअप बताया जाता है।

ब्यूरोक्रेट्स को देश को, जिले को, राज्य को, मंत्रालय को चलाने की सीख दी जाती है। समय-समय पर रिफ्रेशर कोर्स होते हैं। यहां से निकला हुआ व्यक्ति अपने नॉलेज, प्रशिक्षण और अनुभव के बूते किसी भी तरह के हालात का प्रबंधन कर सकता है।

वो पीएसयू चला सकता है, विभाग चला सकता है, देश विदेश से नेगोशिएट कर सकता है, किसी भी संस्थान को शीर्ष से धारा दे सकता है। तमाम पॉलिशिंग के बाद उसे राष्ट्र के एग्जीक्यूटिव की जिम्मेदारी दी जाती है।

इन प्रशिक्षित ब्यूरोक्रेट्स के ऊपर राजनीतिज्ञ होते हैं। जनता के प्रतिनिधि, जो चुनकर आते हैं इन्हें पार्टी ने किस तरह का प्रशिक्षण दिया होता है,ध्यान दीजिए। ??

भीड़ जुटाना, धरना प्रदर्शन, चक्का जाम, हाय हाय, पुतले फूंकना, बूथ को मजबूत करना, वोटर निकालना, नये सदस्य बनाना राजनैतिक कर्म है। ट्वीट, पोस्ट, फ़ारवर्ड ट्रोलिंग और गाली भी कोर्स में अपडेट हो चुका है। तात्कालिक रूप से यह आक्रमकता काम की है।

मगर इसी से पके-तपे लोग सरपंच, जिला पंचायत, पार्षद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनकर आते हैं। क्या भावी उच्च प्रशासनिक पदों के लिए यह लोग तैयार होते हैं? प्रशिक्षित होते हैं?

क्या देश के राजनैतिक प्रबन्धन की जिम्मेदारी संविधान में जिन संस्थाओं, याने राजनैतिक दलों को को दी है, वे क्या अपना ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट ठीक से कर रहे हैं। क्या प्रशिक्षण सत्र, पागलपन के नारों के इर्द गिर्द बुनना ठीक है? क्या यह देश हित मे है?

देश छोड़िए, क्या पार्टी के हित में है??

हम दिल से चाहते हैं कि वंशवाद न रहे। एलिटिज्म न रहे। सत्ता चंद हाथों में न रहे, उस पर हर किसी का खुला दावा बना रहे। एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री बन जाये, भारत के लोकतंत्र की इससे बड़ी खूबसूरती क्या हो सकती है।

मगर यह भी देखना होगा, एलिटिज्म को सड़क छापिज्म से रिप्लेस करना बेहद खतरनाक है। जीवन भर फाल्स नोशन, झूठी जानकारी, खोखले प्राइड और नफरतों पर पाले गए लोग जब कुर्सी पर बैठते हैं, तो ख्याली पुलावों को वास्तविकता से तालमेल बिठाते बिठाते ही बरसों निकल जाते है। इसके बावजूद उनकी बेसिक ग्रुमिंग – ट्रेनिंग- विचारधारा, उचित प्रशासनिक निर्णय में बाधा बनी रहती है।

नीचे एक प्रशिक्षण की स्मारिका देखिये और सोचिये की इस प्रशिक्षण से निकला कार्यकर्ता कल को विदेशमंत्री या रक्षामंत्री के पद पर पहुँच जाए, तो अपनी खामख्याली भारत की विदेश या सुरक्षा नीति को किस चश्मे से तैयार करेगा। अल्पसंख्यको के प्रति नफरत में, बरसों तक ग्रेजुएट किया गया कोई गृहमंत्री या मुख्यमंत्री किसी दंगे के समय क्या राजधर्म निभा सकेगा?

उत्तर आपके इर्द गिर्द मंडरा रहा है। आप और हम, एक पूरी पीढ़ी इसके नतीजे भुगत रही हैं। दल और देश हास्यापद होकर भुगत रहा है। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा तमाम पॉलिसीज से नफरत करने के बावजूद, एक दल के रूप में इसकी इज्जत करता आया हूँ। आज भी इसमे अच्छे प्रशासक मौजूद हैं।

मगर वे अच्छे प्रशासक आज के नए कार्यकर्ता के आइकन नहीं। गाय, गोबर, मंदिर मस्जिद, अखण्ड भारत, 370, समान नागरिक संहिता, नेहरू, पाकिस्तान, विश्वगुरु के हैलुसिनेशन एक समूचा राजनैतिक विमर्श खड़ा है।

रिटोरिक और जिंगोइंज्म की राह चलने वालों को पुरस्कृत होते देखकर, जमीनी कार्यकर्ता भी उसी दिशा में बढ़ना चाहते हैं। उल जलूल बयान और हरकतों में दक्ष हो रहे हैं। बल्कि डेलिब्रेटली प्रोत्साहित, बढ़ाए और दक्ष किए जा रहे हैं। अब तो और आगे जाकर स्थायी प्रतिगामी पीढ़ी, याने एक वृहदाकार पागल वोटर वर्ग तैयार किया जा रहा है।

सोच ये है कि इससे सत्ता पर्पेचुअल रहेगी। मगर ऐसा कभी होता नही। सत्ता के कुछ बरस बाद, सत्ता की दिशा पर सवाल उठने लाजिम हैं। इससे ऊब, चिढ़, नफरत और अविश्वास होना लाजिम है। जिंगोइंज्म के ग्रेजुएट्स को, असल चुनौतियों से निपटने का प्रशिक्षण नहीं है।

इन्हें प्रशासन का प्रशिक्षण नहीं है, नेगोशिएशन का प्रशिक्षण नहीं है, इन्हें प्रबंधन का प्रशिक्षण नहीं है, बात करने का प्रशिक्षण नहीं है। असल में पार्टी मशीनरी का पुर्जा बनने और नौटंकी के अलावे इनके पास किसी भी सेंसफुल काम का कोई प्रशिक्षण नहीं है। तो उस क्रूशियल पल में अपने आपको, और पार्टी को बचाने का प्रशिक्षण नहीं है और इसका जिम्मेदार इनका राजनैतिक दल है, उनका कार्यकर्ता नहीं है।

नोट- इसके लेखक मनीष सिंह समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं और सोशल मीडिया में उनकी रचनाएं पहुत लोकप्रिय हैं।

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