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धर्मान्तरण मुद्दा या विभेद की साजिश ? इस मुद्दे का क्या है हक़ीक़त और क्या है फसाना, पढ़िए पूरी खबर


सत्ता के चालों की मुनादी।। आजकल प्रदेश में महंगाई से बड़ा मुद्दा धर्मान्तरण हो गया है। धर्मान्तरण के नाम पर रोज बवाल काटा जा रहा है और प्रदेश में विपक्षी भाजपा इसे बड़ा मुद्दा बनाकर हर जगह एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही है। यही नहीं धर्मान्तरण के नाम पर पादरियों की पिटाई भी की गई है। कवर्धा में जहां घर में घुसकर एक पादरी को मारा गया वही रायपुर थाने में भी इस मुद्दे पर जमकर बवाल हुआ। थानाध्यक्ष के कक्ष में ईसाई पेरिस्ट की पिटाई की गई।

इस मामले में प्रदेश के विपक्षी पार्टी भाजपा मुखर है। हालांकि इस पार्टी का मुख्य एजेंडा धर्म आधारित ही होता है मूल्य या समस्या आधारित नहीं। इससे भावनाएं भड़काई जा सकती है और उसे मतदान के रूप में भुनाया जा सकता है और इस मुद्दे का असल उद्द्येश्य भी लगता है। लेकिन धर्मान्तरण यदि हो रहा है तो इस समस्या की तह में जाकर उसका निदान कोई करना चाहता है क्या ? सवाल यह है।

इस मामले में सत्ताधारी कांग्रेस ने भी ताल ठोककर चुनौती दे दी है कि भाजपा कोई पीड़ित को सामने लाये । जिन 200 शिकायतों की बात भाजपा ने की है उसे सरकार को दें तब उसका निराकरण विधि सम्मत तरीके से किया जाएगा। लेकिन इस मसले पर सिर्फ राजनीतिक बातें ही जारी है। इस मुद्दे के तह तक कोई जाना नहीं चाहता।

पिछले दिनों munaadi.com द्वारा एक समुदाय विशेष के लोगों द्वारा लगातार किये जा रहे धर्मान्तरण पर story किया गया था। यह समाज दबा और शोषित समाज के रूप में सालों से समाज में अलग-थलग पड़ चुका था। आरक्षण के कारण जब उन्हें पढ़ाई और सरकारी नौकरियों में तबज्जो मिली तो उन्होंने देखा कि उन्हें उनके धर्म में तो सम्मान ही नहीं दिया जाता। उनके अंदर भेदभाव और छुआछूत को लेकर एक गुस्सा पैदा होने लगा। इसका असर ये होने लगा कि जिस समाज में जन्म हो या मृत्यु रामायण का पाठ जरूरी होता था, बंद हो गया। इस समाज से लोग दूसरे धर्म में पलायन करने लगे। उनके धर्म के इस पलायन के लिए न तो कोई इन्हें पूछने गया न ही रोकने। आज इस समाज के 80 प्रतिशत लोग दूसरे धर्म मे पलायन कर गए। धर्मान्तरण पर बात होती भी है तो इनकी बात नहीं की जाती है। ऐसे में इस समाज का बड़ा तबका कई धर्मों में पलायन कर गया लेकिन धर्म के ठेकेदारों ने उनसे मिलना तक मुनासिब नहीं समझा।

धर्मान्तरण एक दिन का काम नहीं होता है। कोई किसी को अचानक जाकर  बरगला दे या पैसे देकर उनका धर्मान्तरण नहीं कर सकता। किसी का धर्म बदलना आसान नहीं होता चाहे वह अपने समाज में कितना भी उपेक्षित क्यों न हो। धर्मान्तरण करने वाले ज्यादातर लोग पिछड़े, आदिवासी और दलित समाज से जुड़े होते हैं उनकी अपनी अलग व्यथा भी होती है। यदि सच में आप धर्मान्तरण रोकना चाहते हैं तो पहले आपको उनकी व्यथा सुननी होगी और उनकी समस्या दूर करनी होगी तब आप इसे रोकने में सफल हो पाएंगे। सिर्फ सड़कों पर नारे लगाकर या दूसरे धार्मिक स्थल और धार्मिक लोगों से मारपीट कर समस्या  से दूर भागना और भावनाएं भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना होता है।

अव्वल तो इस मुद्दे में कोई पीड़ित नहीं होता। धर्मान्तरण जबरदस्ती या छलकपट करके करना अभी के समय में मुश्किल है। जब प्रदेश में भाजपा का शासन था तब भी लोग दूसरे धर्म मे जा रहे थे आज भी यह क्रम जारी है लेकिन इसका हल ईमानदारी से निकालना है तो उनलोगों के पास जाना होगा जो धर्म से पलायन कर रहे हैं। उनके सामाजिक समस्याओं के निदान के अलावा उन्हें पलायन से रोकने का और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

इस धर्मान्तरण के पीछे अंधविश्वास भी बड़ा कारण है। जैसे किसी ने ताबीज देकर, फूंककर या पानी छिड़ककर कुछ लोगों का उपचार किया और दावा किया कि उसने अपने धार्मिक शक्ति से उन्हें ठीक कर दिया तो जो पहले से ही अंधविश्वास के भंवर में फंसे हैं उन्हें लगता है कि वे उसके फूंकने, ताबीज देने या पानी छिड़कने से ही ठीक हुए हैं, तो वे उनके साथ हो लेते हैं और उनके पूजा पद्धति को भी अपना लेते हैं।

एक राजपत्रित अधिकारी जिन्होंने हाल ही में अपना धर्म परिवर्तन कर लिया उनसे जब हमने उनका कारण पूछा तो उन्होंने बिना लाग लपेट के कहा – वे हमारे पास आते हैं और हमें पूछते हैं। समय पर खड़े रहते हैं और बराबरी का सम्मान देते हैं, आप ऐसा करेंगे क्या ? जब हमें छूने से आप अपवित्र हो जाते हैं तो हमे अपने धर्म में रखना क्यों चाहते हो ? उन्होंने यह भी कहा कि अपने धर्म के लोगों का हाल जानने की फुर्सत है किसी को ? सब कहते हैं धर्मान्तरण हो रहा है, तो जो धर्म बदल रहा है उसे वापस लाने की आपने कोई कोशिश की ? वापसी पर उसे किस जात में वापस लाओगे ? और जब इसी जाति में वापस आना है तो हम क्यों वापस आएं ?

समाज के एक वरिष्ठ सामाजिक नेता से जब हमने धर्मान्तरण पर चर्चा की तो उनका दो टूक कहना था सबकी अपनी मर्जी है, जबरदस्ती तो नहीं है कि आप हमारे साथ न रहो और हम आपके साथ खड़े रहें। उन्होंने यह भी बताया कि जब इस समाज में धर्मान्तरण व्यापक रूप में हो रहा था तब किसी ने टोका तक नहीं, शायद उन्हें भी हमारे जाने का इंतजार था।

हालांकि अभी भी कई समाज अपना धर्म छोड़ने को किसी भी कीमत पर राजी नहीं होते और उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला जबकि वे भी सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं। कई लोग ऐसे भी है जिनके परिवार के ज्यादातर लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया पर वे अपने परिवार के साथ नहीं गए। यह उनकी निष्ठा दृढ़ निश्चय है, जिसके लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता। समस्या का निदान चाहिए तो समस्या के पास जाना चाहिए सड़क पर नारे लगाने से या समाज में विभेद फैलाने से समाधान नहीं मिलता।

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