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फटी हुई जीन्स से झांकती समाज की औरत विरोधी मानसिकता, पढ़िये नजरिया

नजरिया की मुनादी।। हालांकि यह पहली बार नहीं है और अंतिम बार भी नहीं जब कपड़ों के, धर्म के, संस्कार के सहारे औरतों पर वैचारिक हमला किया गया हो। इससे पहले भी हुआ है और आगे भी होगा। इसका समर्थन सिर्फ पुरुष ही नहीं कई महिलाएं भी कर रही हैं। आपको याद होगा जब पहली बार घर-घर में TV का पदार्पण हो रहा था और कहानी घर घर की, कसौटी ज़िंदगी की जैसी महिला प्रधान धारावाहिक कहानियां उसमें दिखाई जाती थी, हंगामा मचा हुआ था। क्या सिरियल है, एक महिला पांच शादियां कर रही है। लोग एकता कपूर को जी भर कर गालियां दे रहे थे। लेकिन इस तरह की सभी सिरियल्स हिट थे, कमाई के रिकॉर्ड तोड़ रहे थे। देखा किसने ? महिलाओं ने। अभी कुछेक साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश के भाजपा विधायक राजेश मिश्रा की बेटी ने एक दलित से शादी कर ली थी, सब उस बच्ची के पीछे पड़ गए थे और उस बच्ची को बद्दुआएं दे रहे थे लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग रही।

दरअसल यह सामाजिक परिवर्तन का दौर है। सब अपने हक़ के लिए आवाज उठा रहे हैं, सोशल मीडिया बड़ा प्लेटफॉर्म है जहां कई लोग खुलकर विचारों को रख रहे हैं। लोग अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं ऐसे में बदलाव का यह समय कई लोगों को रास नहीं आ रहा, खासकर धर्म, समाज, संस्कृति के ठेकेदारों को। यही कारण है कि जब भी उन्हें मौका मिलता है वे इस बदलाव पर बयानों से प्रहार करते रहते हैं और उनको उनके जैसे लोगों का समर्थन भी हासिल हो जाता है। समर्थन देने वाले समान पार्टी, विचारधारा या समाज के न होने के बावजूद उनकी हां में हां मिलाते हैं क्योंकि वे भी इस बदलाव से सहज नहीं हैं। उनके अंदर का पुरुषत्व जाग गया है।

जहां तक फटी जीन्स का सवाल है यह फैशन पुरुषों में भी प्रचलित है लेकिन हम बात सिर्फ महिलाओं के लिए कर रहे हैं। वैसे एक बात बता दूं मैनेआज तक इस तरह की जीन्स नहीं खरीदी है बल्कि एक मित्र जब भी ऐसी जीन्स पहनते उन्हें पूछता था, कहीं गिर गए थे क्या ? वे मुस्कुरा देते। लेकिन बात यहां जीन्स के फटे होने की नहीं समाज के बिचारों के फटे होने और उसके चिथड़े होने की है। आप फटी जीन्स के बहाने लड़कियों के घुटने और जांघ में तांक झांक कर रहे हैं और वह भी संस्कारों के नाम पर। आपने कभी पुरुषों के उस मानसिकता में झांकने की कोशिश नहीं कि जो महिलओं को सिर्फ एक भोग्या के नजरिये से देखता है। गालियां सिर्फ महिलाओंके नाम पर देने वालों को नहीं समझाया जाता। बीच सड़क पर अश्लील गालियां देनेवाले पुरुषों के लिए कोई महापुरुष बयान नहीं देता क्योंकि यह पहले से हो रहा है। उपदेश सिर्फ महिलओं के लिए ही ।

आप उनकी पूजा की रस्में तो निभाते हैं लेकिन उनके भावनाओं को समझने की कोशिश भी नहीं करते हैं। जब महिला अपना हक मांगती है या अपने अधिकार की बात करती है तो उसे संस्कार और समाज के नाम पर उसे दबा दिया जाता है क्योंकि इस बदलाव में पुरुष अपने अधिकार पर अतिक्रमण की तरह देखता है। यही कारण है कि पुरुषों की मानसिकता को नजरअंदाज किया जाता है और महिलाओं के रहब-सहन, पहनावा, आचार-विचार पर व्याख्यान दिए जाते हैं।

घर में, परिवार में, समाज में यदि कहीं कोई महिला है तो उसका दायरा पुरुष तय कर देगा और अपेक्षा यह कि वह इसपर अपना मुंह भी न खोले क्योंकि उसका धर्म और संस्कार यही है। यदि उसने मुंह खोलने शुरू किया तो इसे दबाया जाएगा, नहीं मानने पर सबसे सरल उपाय यह है कि उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया जाएगा। संस्कार, समाज, परिवार सबका बोझ महिलाओं और लड़कियों के ऊपर ही है और इस बात से 80 प्रतिशत लोग इत्तिफाक भी रखते हैं।

सबरीमाला मंदिर की घटना याद है ? वहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है, सुप्रीम कोर्ट के उनके हक में आये फैसले के बाद जब महिलाओं ने वहां जाने का प्रयास किया तो हंगामा इतना मचा की सरकार भी महिलओं को उस मंदिर में प्रवेश नहीं दिलवा सकी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यह समाज किसी भी दबे, पीड़ित को उसका अधिकार देने में उदार नहीं है और वह इस बदलाव को अपने अधिकारों पर चोट समझता है। यह सिर्फ महिलओं की ही नहीं दलितों, आदिवासियों के लिए भी यही स्थिति है क्योंकि समाज का बड़ा तबका बदलाव के लिए तैयार ही नहीं है। दलितों आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए कड़े कानून बने होने के बाद भी उनपर न तो अत्याचार रुक सका न ही उनका शोषण होने से सरकार बचा पा रही है।

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