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कोविड सुनामी के बाद आर्थिक सुनामी का दौर, टटोलिये अपने जेब, हाथ रखिये दिल पर और बताइए कि ……… पढ़िये आर्थिक विश्लेषण करता जबरदस्त लेख

सोशल मीडिया की मुनादी।। समसामयिक विषयों पर अपने वेवाक विचार रखने वाले मनीष सिंह ने इस बार पोस्ट कोविड आर्थिक सुनामी के बारे लिखा है। उनका मानना है कि इसके सिर्फ कोविड ही नहीं 5 सालों से चली आ रही आर्थिक नीतियां हैं। पढ़िये उनका लेख हू-ब-हू –

आम सुनामी की तरह ये गरजती हुई नही आई, और न ही इसने मिनटों में बर्बादी करके आपका ध्यान खींचा। कोविड से आप बच गए, लेकिन आपके फेफड़ों की हवा, सुनामी ने खींच ली है।

विश्वास नही होता?? खुद के मार्केटिंग पैटर्न को देखिए। खरीदारी का कोई प्लान है? गाड़ी, टीवी, मकान, टूरिज्म.. तो छोड़िये भाई साहब। नए कपड़े खरीदने की क्या प्लनिंग है? नई शर्ट, कब खरीदी थी, जूते, चश्मा.. मैं सस्ते आइटम्स की बात कर रहा हूँ।

दीदी लोग, आंटीजी, नई साड़ी कब खरीदी दी?? पार्लर का लास्ट विजिट कब किया? पिछली ज्वेलरी कब खरीदी थी। पिछली तीन खरीद के बीच का अंतराल याद कीजिए। हर बार पिछले के मुकाबले, अगली बार,थोड़ा ज्यादा समयांतराल मिलेगा।

न। मूड न होने, मिनिमलिस्टिक जीवन फलसफे का ड्रामा मत कीजिए। जेब हल्की हो चुकी है आपकी। सचाई यही है, खुद से कह लीजिए की मुझे खास फर्क नही पड़ा, लेकिन पड़ा तो है। और जबरजस्त पड़ा है।

सब पर। लॉकडाउन खुल चुका हो, तो बाजार घूम आइये। मरघट सा सूनापन मिलेगा। बाजार राशन, दूध सब्जी से गुलजार नही होता। बाजार में 85 फीसदी खर्च गैरजरूरी चीजो पर होता है। यही हमारी जीवन शैली है, जो समृद्धि के साथ साथ… आवश्यकता से सुविधा औऱ फिर लग्जरी की तरफ जाती है।

लग्जरी वालों की खर्च की हैसियत सुविधा, और सुविधा वालो की हैसियत आवश्यकता पर गिर गयी है। आवश्यकता वाले तो खैर आदतन दारू और पांच सौ में बिकते रहे हैं। आपने अपनी हैसियत किस कीमत पर बेची???

पूछिए खुद से। कोविड और किस्मत??? नही।।

ढलान चार साल पहले शुरू हो चुकी थी। कोविड ने तो बस इस तमस को तेज भर कर दिया। जो दस साल में होता, इकट्ठे हो गया। आप भी तो यही चाहते थे।

भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था के दो इंजन हैं। फॉरेन ट्रेड और डोमेस्टिक डिमांड। विदेश व्यापार, पूर्णतः सरकार की नीतियों पर निर्भर है। सरकार फिसड्डी रही है,ऐसा विदेश व्यापार के आंकड़े कहते हैं। कुछ हमारे माल या सर्विस क्वालिटी पर भी निर्भर करता है, उसमे हमारे उद्योगपति फिसड्डी हैं।

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दूसरा डोमेस्टिक डिमांड। हमारी जनंसख्या, (जिसे बंगलादेशियों ने घुसपैठ करके बढ़ा दिया, या जिसे एक साथ दस्त लगे तो 30 पखाने एक साथ नही बना सकते, वही अकूत जनसँख्या) बाजार है। लेकिन तब, जब उसकी जेब मे खरीदने के लिए पैसा हो। अब उसकी जेब, आपकी तरह खाली है।

उसका एक्सपेंडिचर पैटर्न, एक लेवल नीचे आ चुका है। इसके पास कमाई के जरिये घटे हैं, और मौजूद जरिये की कमाई घटी है। दोनों इंजन सीज हैं, चारो टायर पंचर है। आपने वी शेप रिकवरी की गप सुनी होगी।

मेरे पास भी आई व्हाट्सप पर।

बन्द कीजिए ये वहास्टप। तबाह कर दिया है आपको। बन्द कीजिए प्राइम टाइम टीवी। जेब की सुनिए।

जो मुक्त हो गए, वो तो गए … आपके सामने जीवन खड़ा है। पास बुक निकलिए, बैलन्स चेक कीजिए। कितनी LIC की किश्ते बकाया हैं, कितनी घर या गाड़ी की। अगले महीने बच्चो की फीस देनी है? दोस्तों और क्लायंट्स के कितने पेमेंट बकाया है??

थोड़ा तो हिसाब कीजिए।

और ये जो आपके जीवन की मुसीबतें बनी है, आपकी चॉइस है। आप दारू और 500 में नही बिके। आप इससे भी सस्ता बिके। एक कदम और बढ़कर, आप तो बेचने वालों में शामिल हो गए। अपना जॉब, कर्मचारी, क्लाइंट, बैंक बैलेंस, धन्धा, फ्यूचर, सब असुरक्षित छोड़ आप किसी और सपने के पीछे भाग गए।

बल्कि आपने खुद भी ऊंची आवाज लगाकर देश बेचा, फ्यूचर बेचा। झटका पहले भी लगा था, पर आपने सोचा… थोड़ी देर के लिए त्याग किया है। बाजार आगे मेकअप कर लेगा। कम्पनी मैनेज कर लेगी, सरकार सम्भाल लेगी, बैंक को कोई बचा लेगा।

नही। यह परमानेंट हो गया है।

आर्थिक सुनामी आपके दरवाजे की झिर्रियों से, दबे पांव जहरीले धुएं की तरह घर मे घुस चुकी है। पहला वार उमंगों पर था, दूसरा योजनाओं पर, अब सर्वाइवल का प्रश्न है। आईना देखिये, शक्ल और जेब पर मौत का साया है।

सुनामी पसर चुकी है।

अरे हां, पिछली “मन की बात” का सब्जेक्ट क्या था, प्लीज कमेंट में जरूर बताएं।

(इसके लेखक मनीष सिंह फेसबुक के लोकप्रिय समसामयिक विषयों के लेखक हैं)

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