Sunday, December 15, 2019
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आदिवासी बच्चों के भूख और कुपोषण से लड़ने की योजना यहां थक चुकी है…..कुपोषण दूर करने की योजना खुद हुई कुपोषण का शिकार …ऐसा क्यों पढें

जशपुर मुनादी।।

पिछड़े क्षेत्रों खास कर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रो में कुपोषण से लड़ने के लिए तमाम कवायद की जा रही है आँगनबाड़ी से लेकर स्कूलों में पौस्टिक आहार देने और वह भी पूरे सप्ताह के 6 दिनों तक मीनू के अनुसार गर्म पौस्टिक आहार देना है ताकि बच्चो में कुपोषण को दूर किया जा सके लेकिन कई जगहों पर हालात यह है कि कुपोषण दूर करने वाली योजना खुद कुपोषण का शिकार हो रखी है। जिसमे से एक जशपुर जिले का बगीचा क्षेत्र भी एक है।

आदिवासी क्षेत्रों में आदिवासी बच्चों की भूख और कुपोषण से लड़ने के एक बड़े साधन के रूप में सरकार मिड डे मील योजना लेकर आई थी। योजना भी जिस रूप में है वो सार्थक भी है, पर जशपुर जिले के बगीचा में यह योजना अब थक चुकी है। जो हाल बीते समय में यहां इस योजना का किया गया है, वो चिंतनीय है।
पर हालात देखिये चिंतन भी कीजिये की कैसे इन आदिवासी बच्चों के हक का दाना भी चुरा लिया जा रहा हैं।कमोबेश पूरे ब्लॉक का हाले बयान कुछ ऐसा ही है। वैसे बगीचा एक आदिवासी ब्लॉक है और यहां के सरकारी स्कूलों में दर्ज संख्या का 85 फीसदी आदिवासी बच्चों का है।
वैसे तो इस योजना को संचालित स्कूलों में स्व सहायता समूहों के माध्यम से किया जा रहा है,और सरकार से ए.एम.यू. भी इनका तय मानकों के दिशानिर्देश के पालन को लेकर है।
पर बगीचा क्षेत्र के जो समूह इस योजना से जुड़े हैं ना तो इस दिशा में काम कर रहे है और व्यवस्था और योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए इन पर कार्यवाही होती तो देखिए फिर इनका मंत्री से लेकर संतरी तक का इनका चक्कर,और आरोपों का दौर, ये चीजें तब होने लगती है जब कार्यवाही हो जाती है।मगर सवाल तो यह है कि इन आदिवासी बच्चों का कसूर क्या है जिनके भूख और कुपोषण से लड़ने के हथियार के रूप में योजना के मानक तय हैं।
समूह तो कम लेकिन उस नाम से काम करते अपरोक्ष लोगों का दखल सब कुछ बयां कर जाता है।जब आप यहाँ के स्कूलों का रूख करेंगे तो चावल और पानी जैसा दाल बहुत मुश्किल से बच्चों को उपलब्ध हो पा रही है। बाकी मीनू क्या है वो शाशन प्रशासन ने तय कर रखा है,पर सतही दशा मूक आदिवासी चुप सा अन्याय के रूप में नैनिहालो के भोजन को देख कसक को दिल मे रखकर चुप हो जाता है, क्योंकि सदियाँ इस आदिवासी को शोषण की इस विवशता में लाकर खड़ा कर रखा है, जहां उसका बोलना मुसीबत लेकर आ जाता है।
कहीं भी आपको बच्चों को मिलने वाला चावल रसोई घरों में नही दिखाई देगा।जब बनना हो तो दो किलो झोले में लेकर कोई आता दिखेगा।दालों में कुछ दाने हल्दी के घोल में नजर आएंगे कभी सब्जी मिल भी गई तो आलू सोया बड़ी के रूप में, भले इस बरसाती मौसम में बड़ी को फंगस ने ग्रास बना रखा हो।समूह महीने का थोड़ा बहुत सामान देकर कभी स्कूलों में झांकते तक नहीं की क्या है क्या नही, शिक्षक बोला अगर इस मामले में तो फिर उस शिक्षक की शामत है, क्योंकि शिक्षक परदेशी है।
बहरहाल यही स्थिति है तो सरकार के आदिवासी बच्चों के भूख और कुपोषण से लड़ने के सारे दावे फेल हैं। हाँ सरकारी आदेशों के मीनू के भूल भुलावे में न रहिएगा, क्योंकि मात्र चार्ट हैं हकीकत से जिनका वास्ता नहीं।बस इतना ही कि योजना तो सुपोषण, मीनू और रुचिकर भोजन की बात सुन-सुनकर खुद ही कुपोषण का शिकार है साहब! कैसे करिएगा ?

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