Tuesday, February 20, 2018
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कहाँ टूटी 600 साल की परंपरा, नही पड़ी बकरों की बली, देवी कैसे हुई प्रसन्न

रायगढ संतोष की मुनादी ।।

करमागढ में पिछले 600 सालों की परंपरा टूट गई है। यहां प्रतिवर्ष मां मानकेश्वरी देवी को प्रसन्न करने के लिए सैकडों बकरों की बली दी जाती है। लेकिन इस साल ऐसा नहीं हुआ। ना तो बल पूजा हुई और ना ही बैगा ने बकरों का खून पिया। सैकडों से चली आ रही यह परंपरा अचानक से क्यों टूटी इस बारे में स्पष्ट तौर पर जानकारी नहीं मिल पा रही है। हालांकि सूत्रों के हवाले से ये खबर आ रही है कि ग्रामीणों और बैगा के बीच तालमेल की कमी के चलते बली पूजा नहीं की गई है।

जिला मुख्यालय से करीब तीस किलोमीटर दूर स्थित ग्राम करमागढ में रियासत काल से ही देवी उपासकों द्वारा शरद पूर्णिमा के दिन बल पूजा करने की परंपरा रही है। बल पूजा के बाद बैगा बकरों का खून पीता है। यहां राजघराने की कुल देवी मां की पूजा की जाती है। इस साल भी गुरुवार को यहां करमा महोत्सव मनाया गया। जैसा कि हर साल यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड उमडती है। इस साल भी उनकी संख्या में कमी नहीं थी। दोपहर तीन बजे के बाद कार्यक्रम ष्षुरु किया गया। इस दौरान रायगढ राजघराने के सदस्य भी मौजूद थे। पूजा ष्षुरु होने के उपरांत माता से मनचाहा वरदान पाने के लिए जमीन पर औंधे मुंह पडी महिलाएं मन्नत मांग रहीं थीं। इसके बाद देवी बना बैगा श्रद्धालुओं को स्पर्ष कर आषीर्वाद दे रहे थे। इस दौरान दर्षकों में कौतूहल बनी हुई थी कि यहां बल पूजा की जाएगी और बैगा बकरों का खून पियेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

क्या है मान्यता

ऐसी मान्यता है कि आज से लगभग 600 साल पहले हिमगीर रियासत के राजा को युद्ध में परास्त होने के बाद उन्हें बेडियों से बांधकर जंगल में छोड दिया गया था। जंगल में भटकते हुए वह राजा करमागढ पहुंच गया। इसके बाद जंगल में देवी ने उसे दर्षन दिया और बंधन से मुक्त किया गया। दूसरी घटना में अंग्रेजों ने लगान के लिए अंग्रेजों ने रायगढ व हिमगीर पर हमला कर दिया। युद्ध करमागढ के जंगली मैदानों पर हुआ था। इस दौरान जंगली मधुमक्खियों ने अंग्रेजों पर हमला करके उन्हें खदेड दिया। इस कारण श्रद्धालु दूर-दूर से अपनी मुराद पूरी करने के लिए यहां पहुंचते हैं।

 

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