Wednesday, January 17, 2018
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जंगल सफारी बस संचालन का तीसरी बार टेंडर रद्द, चूक या कमीशन का खेल ? पढ़िए इनसाइड स्टोरी

 

रायपुर मुनादी ।

देश का पहला मानव निर्मित जंगल सफारी का खिताब हासिल करने के बाद वहां के जिम्मेदारों की वजह से महकमें को अब लाखों रुपए का नुक्सान उठाना पड़ेगा। जानबूझकर बरती गई लापरवाही की वजह से तीसरी बार जंगल सफारी आने वालों के लिए संचालित सरकारी बसों का ठेका निरस्त कर दिया गया है।
नया रायपुर में सफारी देखने आने वालों के लिए उन्नत और अच्छी यात्री बस सुविधा देने ठेका निकाला गया था। वनमण्लाधिकारी कार्यालय ने सबसे लोवेस्ट रेट में महज 14 लाख 85 हजार में 25 यात्री बसों के संचालन का टेंडर कॉल किया। पहला माह फरवरी 2017 में टेंडर निकाला गया जिसमें कन्हैया ट्रांस्पोर्ट, दुर्गाम्बा और रॉयल ट्रांस्पोर्ट शामिल हुए थे। जिसमें तीन बार रॉयल ट्रांस्पोर्ट के नाम निविदा स्वीकृत हुई पर बिना पुख्ता कारण के जंगल सफारी के वनमण्लाधिकारी कार्यालय ने उसे निरस्त कर दिया। तीसरी बार ठेका निरस्त करने में करीब 3 माह लग गए। नियमानुसार निविदा की कंडिका 25 के अनुसार ठेका दे देना था। बताते हैं कि 25 बसों का संचालन 15 लाख रुपए के अंदर ही करना था। रॉयल ने दो प्रतिस्पर्धी ट्रांस्पोर्टरों से भी कम रेट 14.85 लाख रुपए भरा था। कायदे से विभाग ने भी इसे स्वीकृत कर लिया पर तीन दिनों के अंदर काम सौंपने के बदले 3 माह तक वर्क ऑर्डर नहीं दिया गया।
अब पुन: तीसरी बार भी जंगल सफारी के ठेका कार्य में बरती जा रही अफसरशाही और गलतियां पता चलते ही लीपापोती करते हुए तीसरी बार रॉयल का ठेका रेट ज्यादा होने का बहाना बताकर टेंडर ही निरस्त कर दिया गया। तीन बार की ठेका प्रक्रिया में बरती गई चूक जानबूझकर है या फिर अपने चेहतों को ठेका सौंपकर कमीशनखोरी की कोशिश यह तो जांच में ही पता चलेगा। परंतु तब तक सस्ते में 25 बसों का संचालन रॉयल ट्रेवल्स करता अब वही काम जंगल सफारी महकमा 20 बसों का संचालन करने में प्रतिमाह 15 लाख 95 हजार रुपए सरकारी पैसा फूंक रहा है। जिसमें 5 बसें कम चल रही है और रजिस्ट्रेशन व फिटनेस के अलावा इंश्योरेंस भी होना बाकि है।

टेंडर कॉल करने और कैंसिल करने का यह खेल
पूर्व में महेंद्रा ट्रेवल्स वालों के जिम्मे ही जंगल सफारी के लिए बस संचालन का काम दिया गया था। बाद में वन विभाग के पैसों से ही जंगल सफारी के यात्रियों के लिए 6 करोड़ रुपए में 25 बसों को खरीदा गया। इसी के संचालन, जिसमें ड्रायवर-क्लीनर की पेमेंट, ईएसआई और अन्य भत्ता समेत, रजिस्ट्रेशन, फिटनेस, इंश्योंरेंस के अलावा डीजल खर्चा भी ट्रांस्पोर्ट ठेकेदार को ही उठाना पड़ता पर विभागीय चूक की वजह से अब यह सारा खर्चा शासन को खुद वहन करना पड़ रहा है।
टेंडर के नियमनानुसार, प्रतिमाह 6 लाख 51 हजार 500 रुपए ड्रायवर की पगार, प्रति ड्रायवर-क्लीनर 13 हजार 800 की दर से 50 स्टाफ की पगार, प्रतिमाह 8 लाख 35 हजार रुपए करीब का डीजल खर्चा होता, बसों के मेंटेनेंस, फिटनेस व अन्य खर्चों का जिम्मा भी ठेकेदार का इस ठेका शर्तों में यह सब कार्य 14 लाख 85 हजार में रॉयल ट्रांस्पोर्ट करता।
जिसे ठेका निरस्त होने के बाद इसी कार्य को 15 लाख 95 हजार रु.में विभाग कर रहा है। बात दे कि जंगल सफारी में अभी 25 नहीं सिर्फ 20 बसों का ही संचालन किया जा रहा है वो भी बिना रजिस्टे्रशन, फिटनेस. इंश्योरेंस के बसों का संचालन विभाग कर रहा है।

इस मुद्दे पर  रॉयल ट्रेवल्स के संचालक सैय्यद अनवर अली ने कहा कि तीसरी बार बिना किसी पुख्ता कारण के बस संचालन का ठेका निरस्त कर दिया गया है। दुर्भावनापूर्ण और कमीशनखोरी का ही एक प्रमाण है। लगातार फरवरी 2017, फिर जुलाई 2017 और उसके बाद अक्टूबर 2017 में लोवेस्ट रेट भरने और सारी शर्तें पूरी करने के बाद मेरी निविदा स्वीकृत हो गई थी। जानबूझकर मुझे वर्क ऑर्डर 3 दिन में देने की बजाए तीन माह से घुमाते रहे और अब अचानक ठेका निरस्त करने की बात सामने आ रही है। मेरा समय, पैसा और यहां तक की 3 लाख रुपए का डिमांड ड्राफ्ट तक जमा करवाया गया है। ठेका शर्तें, पूरी प्रक्रिया विभाग के अनुभवी अफसरों के मार्गदर्शन में हुआ है तो फिर इसे निरस्त करने का कोई तुक समझ नहीं आता।
वहीं दूसरी तरफ, आरके.सिंह, पीसीसीएफ छग ने मुनादी.कॉम से फोन पर चर्चा करते हुए कहा कि मैं फोन पर इस विषय मे कुछ भी नही कह पाऊंगा, आप कार्यालय आकर चर्चा कर ले फिर देखता हूं चूक हुई है या फिर जानबूझकर किसी प्रकार की लापरवाही बरटी गयी है।

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