Thursday, June 21, 2018
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दिव्यांग बनेगे डिजिटल, कुछ कदम तुम चलो कुछ हम तब छू लेंगे आसमान

 

गोरखपुर से धनेश की मुनादी

कहते हैं ऊँची उड़ान के लिए सिर्फ पंख का होना जरुरी नहीं उसके लिए जरुरी है हौसले का होना. यदि हौसला है तो उड़ान कितनी भी ऊँची हो, मुकम्मल होती है. लेकिन उसमें हौसला भरने वाला भी हो जो उसे एहसास दिलाये की हम तुम्हारे साथ गलत नहीं होने देंगे. गोरखपुर के कुछ दिव्यांग दृष्टिहीन बच्चों को डिजिटल इंडिया के अनुसार बनाने की पहल की जा रही है लेकिन सरकारी सहयोग से यह काम ज्यादा बेहतर किया जा सकता था. सरकार को ऐसे संस्थाओं के लिए अपने हाथ बढ़ने चाहिए.

सरकार जहां डिजिटल इंडिया की ओर आगे बढ़ रही है और उसके लिए सभी को तैयार कर रही है वही इस दौड़ में दिव्यांग बच्चे बहुत पीछे छूट गए हैं। गोरखपुर में मुनादी डॉट कॉम की टीम ने कुछ ऐसे ही नेत्रहीन बच्चों को खोज निकाला जो किसी प्राइवेट संस्था के माध्यम से डिजिटल इंडिया की ओर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। यह संस्था गोरखपुर के ही अलादादपुर स्थित एक छोटे से कमरे में इन दिव्यांग बच्चों को कंप्यूटर प्रशिक्षण के साथ साथ और कई चीजें भी सिखाती है जिससे वह समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। कंप्यूटर पर फटाफट टाइप करते इस बच्चे को देखकर आपकी आंखें शायद भरोसा ना करें कि इनकी आंखें नहीं ये बच्चे वो सब कुछ कर सकते हैं जो एक आंख वाला इंसान अपनी पूरी रोशनी के साथ कर सकता है। चाहे फिर कंप्यूटर पर कोई वेब एड्रेस ढूंढना हो या फिर टाइपिंग करनी हो और या फिर प्रिंट आउट निकालना सब कुछ है बड़ी आसानी से अपनी मन की आंखों से कर लेते हैं। यह सब कुछ कर सकते हैं जो एक सामान्य आदमी कंप्यूटर पर अपनी पूरी क्षमता के अनुसार कर सकता है। आप की आंखें खोल देने वाली खबर की गहराई में जब हम गए  तो  हमें पता चला कि सब कुछ संभव हो पाया है एक संस्था ब्लाइंड चाइल्ड एजुकेशन एंड हैंडीकैप्ड डेवलपमेंट सोसाइटी के रहमों करम से चल रही है। यह संस्था केवल अपने निजी प्रयासों से ही इनको डिजिटल इंडिया से जोड़ने का काम कर रही है। सबसे अच्छी बात यह है यहाँ पर पूर्वांचल की पहली और एक मात्र बोलती लाइब्रेरी भी यहाँ मौजूद है। यहाँ पर बच्चे लगभग भारत के हर कोने से आते है।  हमारा सरोकार यह नहीं है कि इस संस्था को वित्त उपलब्ध कराया जाए बल्कि इससे मतलब है कि जो काम सरकारों को करना चाहिए वह इन संस्थाओं के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता है। अगर आप डिजिटल इंडिया की बात करते हैं तो क्या यह दिव्यांगों पर भी लागू होनी चाहिए?

इंटर पास करने के बाद इन बच्चों को कंप्यूटर की पूर्ण रुप से शिक्षा देने के लिए कोई भी मुकम्मल व्यवस्था नहीं है और अगर है भी तो वह तकनीकी रूप से पिछड़े है। हाल हालात और हैसियत की तीन तरफा मार खाए इन बच्चों का सहारा है बस यही एक छोटा सा कमरा जिसमें इनको अपनी तकदीर  से लड़ाई लड़नी है। भले इन आंखों में रोशनी ना हो लेकिन अभी इनके सपनों की मौत नहीं हुई है।

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