Wednesday, September 26, 2018
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सबके अपने अपने गांधी : गांधी जयन्ती पर गुड़ी ने करायी सार्थक परिचर्चा

रायगढ़  मुनादी ।।

सांस्कृतिक एवं वैचारिक संस्था गुड़ी की ओर से गांधी जयन्ती पर अग्रसेन भवन में गांधी पर केन्द्रित एक बौद्धिक परिचर्चा का आयोजन संपन्न हुआ | डाक्टर राजू पाण्डेय के आधार आलेख : “सबके अपने अपने गांधी ” का वाचन सर्वप्रथम रविन्द्र चौबे ने किया और कहा कि गांधी जी के चंपारण सत्याग्रह का यह शताब्दी वर्ष है और देखा जाए तो इस चंपारण सत्याग्रह के उपरान्त ही गांधी भारतीय जनमानस में एक सशक्त नायक की तरह उभरे और स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु उनकी तरफ पूरा देश आशा भरी निगाह से देखने लगा | आधार आलेख को केंद्र में रखकर चर्चा को गति प्रदान करते हुए मदन पटेल ने कहा कि यह बात सच है कि वाम एवं दक्षिण पंथी विचारधाराओं ने अपने हिसाब से गांधी को परिभाषित करने की कोशिश की और उसका उपयोग करने का प्रयास भी किया पर गांधी की अतिरिक्त चेतना ने उन्हें उनका उपयोग होने से हमेशा बचाए रखा इस कारण उनके मतभेद उभर कर सामने आए | मुकेश जैन ने इस अवसर पर कहा कि आलेख में वर्णित कतिपय बातें अधूरी हैं | उन्होंने कहा कि गांधी के साथ तत्कालीन कांग्रेस के कई सहकर्मियों के भी गहरे मतभेद रहे जिसका उल्लेख इस आलेख में नहीं है | उन्होंने इस बात पर असहमति जताई कि गांधी के आर. एस. एस. से कभी गहरे मतभेद रहे | डा. राजू अग्रवाल ने चर्चा को गति प्रदान करते हुए कहा कि गांधी और उनकी विचारधारा को अगर भारतीय जनमानस से अलग करके देखें तो एक शून्यता उभरकर सामने आती है | उन्होंने गांधी दर्शन को लेकर कहा कि गांधी ने बड़े उद्योगों की जगह ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत उन अस्सी से नब्बे प्रतिशत लोगों के रोजगार की हमेशा चिंता करते हुए लघु एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना पर बल दिया था , चूँकि उनके इस दर्शन को देश में दरकिनार किया गया इसलिए देश की अर्थव्यस्था खस्ताहाल होकर कुछ ही लोगों के हाथों में आज बंधक बनकर रह गई है और हमें फिर से गांधी याद आ रहे हैं | डाक्टर राजू अग्रवाल ने आगे कहा कि सामाजिक अन्याय एवं भेदभाव के बिरूद्ध भारतीय जनमानस में जो अतिरिक्त चेतना आज हम देख रहे हैं वह गांधी जी की ही देन है जिसका सूत्रपात अपने समय में उन्होंने कर दिया था | वे जातिप्रथा एवं छुआछूत के सख्त खिलाफ थे उसकी खिलाफत के कारण समाज में काफी हद तक उसका उन्मूलन हो सका | डाक्टर राजू अग्रवाल ने एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि स्वच्छता के लिए गांधी जी किसी को काम सौंपते नहीं थे बल्कि साफ़ सफाई अपने हाथों से वे स्वयं किया करते थे इसलिए आज भी जनमानस में वे अलग से चिन्हित होते दिखाई पड़ते हैं | अजय आठले ने बोलते हुए कहा कि कई जगह अम्बेडकर और गांधी के गहरे मतभेद रहे हैं और गांधी के दबाव में आकर अम्बेडकर को पूना पेक्ट में हस्ताक्षर करना पड़ा , इन सबका उल्लेख इस आलेख में होता तो गांधी को समझने में और सहूलियत होती | मुमताज भारती पापा ने हिन्द स्वराज की विस्तृत चर्चा करते हुए वैश्विक आर्थिक उदारीकरण और आर्थिक मंदी के सन्दर्भ में गांधीवाद की उपयोगिता को पूरी दुनियां के लिए उपयोगी बताते हुए उनके आर्थिक और सामाजिक चिंतन पर कई महत्वपूर्ण बातें रखीं | परिचर्चा में ईशा मिश्रा , हर्ष सिंह , प्रशांत शर्मा , गुड़ी के साथी विवेक तिवारी एवं अनुपम पाल , पी. एस.खोडियार सर ,रमेश शर्मा , तरूण बघेल ,कैलाश अग्रवाल ,पत्रकार साथी विनय पाण्डेय ,विनोद बोहिदार ने भी भाग लेकर इस गोष्ठी को गति प्रदान की | अंत में परिचर्चा को संचालित कर रहे रविन्द्र चौबे ने गांधी पर केन्द्रित रमेश शर्मा की कविता का पाठ किया और कहा कि ऎसी परिचर्चाओं का क्रम आगे भी बना रहे इस दिशा में हम सभी मिलकर प्रयास करें |

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