Sunday, May 20, 2018
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स्याह अँधेरे वाले समय में आज भी मुक्तिबोध उम्मीद की किरण की तरह

रायगढ़ मुनादी ।।

 

 

नीलांचल भवन में छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की ओर से मुक्तिबोध जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर जयन्ती 13 नवम्बर को उनकी कविताओं के पाठ के साथ साथ उन कविताओं पर टिप्पणी एवं आज की चुनौतियां और मुक्तिबोध का रचना कर्म बिषय पर व्याख्यान संपन्न हुआ |प्रशांत शर्मा , दीपक यादव एवं अजय आठले द्वारा मुक्तिबोध की कविताओं के पठन उपरान्त प्रोफेसर उषा आठले ने मुक्तिबोध की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि मुक्तिबोध अपनी कविताओं में जो फेंटेसी रचते हैं वह दूर से भले ही दुरूह लगता है पर जब उन कविताओं में हम उतरकर अपने समय को ,अपने जीवन को देखते हैं और उसे आत्मसात करने की कोशिश करते हैं तब मुक्तिबोध आम जन जीवन के कवि होते चले जाते हैं | देखा जाए तो मुक्तिबोध की कविताओं में प्रयुक्त फेंटेसी जिसमें जीवन का संत्रास है , समय की भयावहता है, अपने आगत में वास्तविकता में रूपांतरित होने वाली सच्ची घटनाएं हैं जिसे साकार होते हम आज देख भी रहे हैं | कार्यक्रम के मुख्य अतिथि , देश के प्रख्यात पत्रकार एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष ललित सुरजन ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि मुक्तिबोध जन्म शताब्दी वर्ष की शुरूवात छ.ग.प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1 जनवरी को रायपुर में हुई थी और एक तरह से उसका समापन रायगढ़ में हो रहा है यह रायगढ़ के लिए गौरव का बिषय है, इस हेतु उन्होंने रायगढ़ के साथियों को बधाई भी दी | उन्होंने रायगढ़ की पुरानी स्मृतियों को ताजा करते हुए छह वर्ष पूर्व आयोजित पूर्व विधायक जननायक स्वर्गीय रामकुमार के जन्म दिन पर अपनी सहभागिता को भी शिद्दत से याद किया | उन्होंने मुक्तिबोध का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें विज्ञान के बिषयों में गहरी अभिरूचि थी और उन्होंने सत्रह साल की उम्र में ही अपनी कविताओं में अपने समय की त्रासदियों को, उसकी भयावहता को , स्याह अँधेरे को देखना परखना शुरू कर दिया था |अपनी कविताओं में जीवन की त्रासदियों , सत्ता एवं पूंजीवादी ताकतों द्वारा निर्मित डरावने समय के काले अंधेरों की परिकल्पना जिस तरह उन्होंने की थी वे सारी बातें आज घटित हो रही हैं | मुक्तिबोध ऐसे दूरदर्शी कवि थे जिन्होंने अपने आने वाले समय की भयावहता को भांप लिया था इसलिए वे आज अधिक प्रासंगिक हो उठे हैं | मुक्तिबोध के बहाने समय सापेक्ष लेखन की भयावहता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज लिखने वालों की कलम पून्जीवादों ताकतों के हाथों बिक चुकी है | आज संसद मार्ग पर सरकार के खिलाफ इकट्ठा हुए देश भर के लाखों मजदूरों की बात पत्रकारों के लिए कोई खबर नहीं बनती , किसानों का जीवन मरण का मुद्दा कोई खबर नहीं बनती | खबर के नाम पर राम रहीम ,हिन्दू मुस्लिम,पद्मावती जैसा कोई उथला हुआ मुद्दा मीडिया में छाया रहता है , ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि लेखन और मीडिया पूरी तरह सत्ता प्रतिष्ठानों और कुछ एक पूंजीवादी घरानों की मुठ्ठी में कैद होकर नृशंस हो चुके हैं | सायबर एवं सोशल मिडिया के जरिये युवा पीढ़ी को पूरी तरह आत्म केन्द्रित करने का षड़यंत्र पूंजीवादी ताकतें रच रही हैं ताकि वे सत्ता प्रतिष्ठानों के अन्याय एवं अत्याचारों से निरपेक्ष हो उस ओर ध्यान केन्द्रित न करें | ऐसे नृशंस समय में मुक्तिबोध का समूचा लेखन हमें आगाह करता है कि हम अपनी चेतना को , अपने विचारों को नए सिरे से टटोलें | हम अपने घर में अपने बच्चों को साहित्य से जोड़ने का काम करें | इस हेतु घरों में बीच बीच में प्रेमचंद , भीष्म साहनी ,अमरकांत जैसे लेखकों की कहानियों का पाठ अपने बच्चों के बीच करें | हर महीने कुछ किताबें खरीदें , अगर यह संभव न हो तो लाइब्रेरी का सदस्य बनकर या अपने मित्रों से किताबें लेकर उन्हें पढ़ें |सवाल जवाब वाले सत्र में अश्विनी का महत्वपूर्ण प्रश्न जो यह था कि तिरपन वर्ष पूर्व मुक्तिबोध की कविताओं में वर्णित समय की भयावहता और स्याह डरावना अँधेरा और आज के समय की भयावहता और स्याह डरावने अँधेरे में क्या फर्क है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ललित सुरजन ने कहा कि तिरपन वर्ष पूर्व स्वतंत्रता आन्दोलन से उपजी कांग्रेस पार्टी में भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ एक दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोगों का समावेश था , फिर भी वह समय इतना डरावना नहीं था जबकि आज का जो डरावना समय है वह एक निरंकुश भीड़ के हाथों में इस तरह आ गया है जो चौराहे पर किसी की भी हत्या कर सकती है मानों उस भीड़ को सत्ता प्रतिष्ठानों ने शह और प्रोत्साहन देकर हत्या करने के लिए खुला छोड़ दिया हो | उन्होंने मुक्तिबोध के बारे में यह भी कहा कि उन्हें समझने के लिए उनके समग्र साहित्य को जानना आवश्यक है | उनकी कई कहानियों का जिक्र करते हुए क्लाड इथरली कहानी के बहाने अमानवीय होती जा रही सत्ता के प्रति भी उन्होंने आगाह किया कि यह सत्ता आम आदमी को अपने बचाव में मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कर सकती है यदि यह उसके विरोध में बात करे |श्यामनारायण श्रीवास्तव ने सम्मेलन की ओर से सबका आभार व्यक्त किया |गोष्ठी में माया सुरजन , प्रोफेसर मंजरी गुरू ,प्रतिमा शर्मा, प्रताप सिंह खोडियार , कैलाश अग्रवाल ,शिवकुमार पाण्डेय , के.के. तिवारी , मुनादी डॉट कॉम के विनय पाण्डेय , पत्रकार प्रमोद अग्रवाल , गणेश कछवाहा , मुकेश जैन ,कमल बोहिदार , के आर यादव , तरुणकांति घोष, के के ठाकुर , गीता उपाध्याय , अंजनी कुमार अंकुर ,मुमताज भारती ,अपर्णा ,महेश गुरुजी ,तिलक पटेल ,नरेन्द्र पर्वत ,डॉक्टर राजू अग्रवाल ,एस के नंदे ,डॉक्टर सुचित्रा त्रिपाठी ,प्रमोद शराफ ,वासुदेव निषाद ,भरत लाल निषाद , नीलकंठ साहू , सहित अनेक बुद्धीजीवी उपस्थित थे और सबने मुक्तिबोध को शिद्दत से याद किया |

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