Tuesday, August 14, 2018
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झीरम घाटी कांड का सच- 1, जांच एजेंसी, सरकार की मंशा और मीडिया की भूमिका पर सवाल

Munaadi Exclusive

 

झीरम घाटी कांड का सच आजतक देश के सामने नहीं आया। सरकारों ने बड़े बड़े जांच एजेंसी से जांच करवाई पर इससे पीड़ित परिवार भी संतुष्ट नहीं है।देश के इतिहास का सबसे लोमहर्षक घटना जो २५ मई 2013 को घटित हुयी थी।  उस दिन कांग्रेस के कई चुनिंदा नेता एक हमले में मार दिए गए थे।  इसमें इस पार्टी के प्रथम पंक्ति के नेता तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष शहीद नन्द कुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा के अलावा नंदकुमार पटेल के पुत्र शहीद दिनेश पटेल की भी हत्या कर दी गयी थी। क्या झीरम का सच इतिहास में दफन हो जएगा ? या राजनीति की भेंट चढ़ जाएगा। इसी लिए हमने शुरू की है पड़ताल।

 

दरअसल इस मामले मे पीड़ित परिवार के जो सवाल हैं उनका जवाब मिलना या सत्ता पक्ष द्वारा उन सवालों का जवाब देना मुश्किल हो गया है। इन्होंने जो सवाल उठाये हैं उसमें सत्ता पक्ष घिरता नजर आ रहा है। इस सम्बन्ध में हमने युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष व इस मामले के पीड़ित उमेश पटेल से हमने बात की जिन्होंने इस कांड में अपने पिता और बड़े भाई को खो दिया। उनसे यह जानना चाहा की इस मुद्दे पर उनके पास कौन से तथ्य हैं जिसके आधारपर वे सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं –

मुनादी – क्या इस बार चुनाव में झीरम घाटी कांड को कांग्रेस मुद्दा बनाएगी ?

 

उमेश पटेल – बिलकुल, क्यूंकि यह सरकार की अबतक की सबसे बड़ी चूक, लापरवाही या षड्यंत्र है, यह मुद्दा होगा जबतक इस कांड के गुनहगार सामने  नहीं आ जाते।

 

मुनादी- जब आप यह कहते हैं की यह राजनितिक  षड्यंत्र  है तो यह भी बताना चाहिए की संदेह किसपर है, संदेह वाली भाग को आप लोग गायब कर देते है, खुलकर इसपर बात क्यों नहीं होती ?

उमेश पटेल – इसमें सरकारी तंत्र की चूक सबके सामने है, न तो रोड ओपनिंग पार्टी थी, न कोई सुरक्षा।  उस समय की स्थिति को देखकर लगता ही नहीं कि परिवर्तन यात्रा को वहां सुरक्षा प्रदान की गयी थी। राजनितिक षड्यंत्र यह इसलिए है क्योंकि इसमें कांग्रेस के बड़े लीडर मारे गए।  इसके पीछे जो हो उसकी जाँच  सरकार  कराये तो सही।  NIA ने जो जाँच की उसमें यह बिंदु ही नहीं था।  ऐसी घटनाओं में दो चीजें होती है पहला मर्डर वेपन और दूसरा मर्डरर, NIA मर्डर वेपन तलाशती रही मर्डरर के बारे में जाँच ही नहीं हुई।  आखिर बन्दुक के पीछे का चेहरा कौन था ? जबतक कोई तथ्य न हो किसी के बारे में बोल पाना सही नहीं है, लेकिन यकीं मानिये हम उस चेहरे को सबके सामने लाने को प्रतिबद्ध हैं जो उस बन्दुक के पीछे था।  यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो जाये तो वैसे भी सारे चेहरे सामने आ जायेंगे।

 

मुनादी – आप इस मामले में पीड़ित हैं, आपको क्या लगता है यह हमला नक्सली हमला था ?

 

उमेश पटेल – यह राजनितिक षड्यंत्र था, मैं पहले ही बता चूका हूँ. हम जब सीबीआई जांच के मांग करने मुख्यमंत्री के पास नेताप्रतिपक्ष के साथ गए थे तब हमें कहा गया कि NIA  जांच कर रही है इसलिए सीबीआई जाँच नहीं हो सकती, जब हमने विधानसभा में घेरना शुरू किया तो उन्होंने सीबीआई जाँच की घोषणा कर दी, लेकिन इन्होने जाँच के आधार में राजनितिक षड्यंत्र जोड़ा ही नहीं।  तो साफ़ है की सीबीआई को उसे मना करना ही था और उसने मना कर दिया।

मुनादी- क्या आपको वर्तमान जांच एजेंसीओं पर भरोसा नही है ?

उमेश पटेल- नही, मैं कह रहा हूँ NIA ने षड्यंत्र के पक्ष की जांच नहीं की, बंगाल में एक मामले में NIA और CBI ने संयुक्त रूप से  जांच की थी, एक ने टेररिज्म साइड की जांच की तो दूसरे ने षड्यंत्र के पक्ष को देखा, इस मामले में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। आखिर इस हमले के पीछे कौन था? इसीलिए हमने सीबीआई जांच की लगातार मांग की है ताकि इससे षड्यंत्र के पीछे कौन है इसका पता चल जाएगा।

मुनादी- क्या इस षड्यंत्र में सरकार शामिल है ? आपको ऐसा लगता है?

उमेश पटेल- मैं यह कहता हूं कि यदि सरकार का हाथ नहीं है तो वह जांच से क्यों डर रही है? उसे सीबीआई जांच के लिए आगे आना चाहिये, राज्य में इनकी सरकार है और केंद्र में भी। तब इन्हें किस बात का डर है। इस घटना के कई महीने बाद एक कथित नक्सली का ईइंटरव्यू लिया जाता है जो कहता है कि नंदकुमार पटेल और दिनेश पटेल क्रॉस फायरिंग में मारे गए, सबको पता है कि सच क्या है, लेकिन एक मीडिया हाउस इसे दिनभर अपने चैनल पर दिखाता है, यह किसके इशारे पर किया गया ? उस झूठ को  बार बार दिखाने से वह सच तो नहीं हो गया। तमाम सवाल हैं और जवाब जरूरी है।

( क्रमशः )

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