Friday, December 14, 2018
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घोटाले और विकास का अन्तर्सम्बन्ध

मुकेश जैन के विचारों की मुनादी

 

 

हमारा दीर्घकालिक अनुभव यह रहा है कि जब-जब हमारे शहर में विकास कार्य किये जाते हैं , तब-तब उसमें से घोटाले भी प्रस्फुटित हो जाते हैं। लगातार एक समान रूप से घटित होने वाली इन घटनाओं से इस सूत्र वाक्य का प्रतिपादन होता है कि ” घोटाला बढ़ते हुए विकास का आवश्यक लक्षण है।”हमारे साहित्यकार इसे कुछ इस तरह से कह सकते हैं कि ” जीवनदायिनी केलो की कछार में जब विकास की तेज लहरें कल-कल के मोहक स्वरों के साथ पर प्रवाहित होती हैं तो उसके जल तल में घोटाला रूपी कीचड़ भी स्वमेव प्रवाहमान हो जाता है। यही प्रकृति का संतुलन व सौंदर्य है।”सीधी व सरल बात को भी क्लिष्ट ढंग से कहने वाले बुद्धिग्रस्त लोग कहते हैं कि “यह मुद्रा राक्षसों की हवस व दरबारी पूंजीवाद का अनिवार्य प्रतिफलन है। इसके कारण अमीर और अमीर तथा गरीब और गरीब होते जा रहे हैं।”अर्थशास्त्र के जानकार विक्रयकर -आयकर अधिवक्ता,बुद्धिजीवी व व्यापारी इसे अर्थव्यस्था का आवश्यक तत्व की मान्यता देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं।बचे-खुचे जनवादी किस्म के पत्रकार तथा सत्ता की आस में व्याकुल विपक्षी नेता इसे ” जनता की खून-पसीने की कमाई पर सत्ताधीशों व नौकरशाहों की खुली डकैती निरूपत कर देते हैं। फिर घोटाले आंदोलन की वस्तु बन जाते हैं तथा अखबार व समाचार चैनल ऊटपटांग बहस में व्यस्त हो जाते हैं।”प्रशासन के लिये “घोटाला” मात्र जाँच का विषय होता है। जाँच की अंतिम परिणीति लीपा-पोती होती है और पूरा प्रकरण “कड़ी फटकार “तक जाकर पूर्णाहुति को प्राप्त हो जाता है।राजपुरुष तो गद्दी पर रहते तक “घोटाले” के अस्तित्व से ही इंकार कर देते हैं। उनके अनुसार यह केवल सरफिरे पत्रकारों व कुंठित विपक्षियों के दिमाग में रह-रहकर उठने वाली एक मिथ्या धारणा मात्र है। उनके राज में ‘घोटाले’ नामक इस धारणा का कोई वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है।परस्पर विरोधी स्वरों के कोलाहल में आम जनता
बस इतना समझ पाती है कि इस व्यवस्था का कुछ नहीं होने वाला है। अंत में वह इसी निराशावादी दृष्टिकोण के साथ तटस्थत आलोचना के अपने प्रिय कार्य में लग जाती है।इन तमाम धमाचौकड़ी को जानने के बावजूद इन दिनों मैं “टॉयलेट घोटाले” से बहुत व्यथित हूँ। आखिर हमारे घोटाले के स्टैण्डर्ड का सवाल है। यह ठीक है कि हमारे घोटाला वीरों ने आदिवासियों की जमीन खा ली, किसानों का धान खा लिया, मुआवजे की राशि खा ली, सड़क,पुल-पुलिये खा लिये, फर्जी मस्टर रोल बना लिये यहाँ तक कि गरीबों का चावल,छात्रों की छात्रवृति व निराश्रितों का पेंशन भी खा लिया लेकिन किसी ने पाखाना नहीं खाया था। लेकिन तुम लोगों ने मल- मूत्र वाले क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा। अरे कमबख्तों, घोटालों के क्षेत्र में हमारे शहर ने जो कीर्ति पताका फहरायी थी उसे तुमने मिट्टी में मिला दिया।
खैर, इसे छोड़ो और तुरंत कोई बड़ा घोटाला करो ताकि आम लोग इस घटना को भूल जायें और घोटाले का स्टैण्डर्ड पुनः स्थापित मानदंडों के अनुरूप हो सके।

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