Sunday, July 21, 2019
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पेट्रोल पंप संचालक किस तरह से साइट प्लान में संशोधन का तीर चलाया, किस तरह से संशोधन आदेश को एक तीर से दो निशाना बनाया …..

Munaadi News

साइट प्लान संशोधन के नहीं कोई राज्य शासन के नियम व निर्देश महेंद्र सिंह कोमल धर्मजयगढ़ पेट्रोल पंप को किया गया साइट प्लान संशोधन

रायगढ़ मुनादी।

जिले के धरमजयगढ़ स्थित महेंद्र सिंह कोमल के द्वारा संचालित बीपीसीएल पेट्रोल पंप पिछले कई सालों से या कहा जाए तो अपने स्थापना से ही विवादों से घिरा रहा है । इसी पेट्रोल पंप में सेल्समैन की मौत पर भी खूब बवाल मचा था। अखबारों में खूब सुर्खियां बटोरी थी। हम फिर से एक बार इसी बीपीसीएल पेट्रोल पंप की बात कर रहे हैं। अभी का मौजू साइट प्लान संशोधन से जुड़ा है।
किस तरह एक रसूखदार दबंगई के आगे प्रशासन पेट्रोल पंप के लिए सारे नियम कानून ताक पर रख दिये जाते हैं।
महेंद्र सिंह कोमल द्वारा पेट्रोल पंप शुरू करने के लिए एक आदिवासी महिला की जमीन पर अवैध कब्जा कर खोले गए पेट्रोल पंप का साइट प्लान यानी नक्शा जो अवैध कब्जे का साक्ष्य बना। जिसेसे निजात पाने के लिए 8 वर्षों तक दिनांक 2.5. 2013 को साइट प्लान संशोधन का आवेदन लगा कर कार्यालय जिला दंडाधिकारी रायगढ़ से दिनांक 30 .12 .2015 को वांछित संशोधन नक्शे में करा लिया गया यानि अब पेट्रोल पंप का नक्शा नहीं दिखा सकता कि वह किसी दूसरे की जमीन पर स्थापित है किसी आदिवासी की जमीन पर अवैध काबिज है।
साइट प्लान का अप्रूवल या संशोधन करने का अधिकार तो वैसे टाउन एंड कन्ट्री प्लानिंग के अधिकारियों के पास होना चाहिए परंतु साइट प्लान संशोधन के इस प्रकरण में तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी राजस्व धरमजयगढ़ द्वारा किया गया है तथा दिनांक 30 .12. 2015 को संशोधन आदेश जारी किया गया है.
प्रकरण के नोट शीट में यह भी देखने में आया है कि साइट प्लान संशोधन के संबंध में राज्य शासन के कोई नियम व निर्देश नहीं है तथा कलेक्टर के अनापत्ति प्रमाण पत्र के शर्त का भी पालन नहीं किया गया है। ऐसे नोट पर संशोधित साइट प्लान का आदेश क्यों जारी किया गया समझ से परे है ।
फर्जी कारनामों की बादशाहत अवैध कब्जे से बचने के लिए ही नहीं अपितु संशोधित साइट प्लान आदेश दिनांक 30. 12 .2015 को विस्फोटक विभाग आगरा के लिए जिला दंडाधिकारी रायगढ़ का अनापत्ति पत्र भी बना दिया गया. जिसके आधार पर कार्यालय आगरा द्वारा विस्फोटक लाइसेंस 4.1. 2014 को जारी गया।
इस तरह यह प्रकरण दर्शाता है कि एक तीर से दो निशाने कैसे बनाए जाते हैं एक तरफ अवैध कब्जे से बचाता है दूसरा जिला दंडाधिकारी की अनापत्ति के नाम से जाना जाता है । यहां यह भी देखने को मिला कि जिसके नाम पर आपत्ति जारी हुई वह दिनांक 13.1. 2014 के दस्तावेज को एनओसी के रूप में प्रधानमंत्री के पीजी पोर्टल में जवाब देता है । जो पूरी तरह से पीएमओ को भी अंधेरे में रख दिया खैर यह नोट सीट ही बताता है कि दिनांक 2.5. 2013 को लगाया गया साइट प्लान संशोधन आवेदन अनापत्ति प्रमाण पत्र निरस्त आदेश दिनांक 5:10. 2013 के पूर्व आवेदित है । अतः अनापत्ति प्रमाण पत्र (दिनांक 30 12 .2015) हो ही नहीं सकता। अब तो आलम यह है कि दिनांक 13 .1. 2014 की माया पेट्रोलियम अधिनियम 2002 जाने की क्या है।
इस पूरे प्रकरण को समझने से पता चलता है कि किसी काम को करने व कराने की बादशाहट में पेट्रोल पंप संचालक का कोई इनका सानी नहीं है। यह सब के बस का रोग भी नहीं, पर प्रकरण तब और भी ज्वलंत हो जाता है जब नोट शीट में न्यायालयीन प्रकरणों की अनदेखी नोट शीट में दर्ज आपत्तियों के बावजूद कोई आदेश सक्षम अधिकारी द्वारा करा लिया जाता है, अपने आप मे बड़ा रोचक तथ्य है।
खैर अब देखना होगा कि इस प्रकरण में ऊंट आगे किस करवट बैठता है । इस प्रकरण में ऐसी पेचीदगी और क्या क्या और किस किस तथ्यों पर आईना दिखाती है …. इस पूरे प्रकरण में यह भी अगर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि जब बोया बीज बबूल का तो …………. प्रशासनिक सर्जरी के साथ में नए बैठे अधिकारियों के लिए भी यह प्रकरण अनुकरणीय सोचनी और दयनीय या दंडनीय होगा यह उनके विवेक पर निर्भर करता है परंतु विषय तो अवश्य जिला दंडाधिकारी के कार्यवाही से ही स्पष्ट होगा।

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