Tuesday, September 18, 2018
Home > Slider > पत्थरगाडी आंदोलन : जानिए अब आगे क्या होगा और अभी क्या हो रहा है ?

पत्थरगाडी आंदोलन : जानिए अब आगे क्या होगा और अभी क्या हो रहा है ?

जशपुर मुनादी ।।

 

बढ़ती गर्मी के साथ तेजी से चढ़ते हुए पारे के बीच जशपुर का  माहौल भी अब गर्म हो चला है । आदिवासियों के मौलिक अधिकार को लेकर गांवों में गाड़े जा रहे शिलालेख के मुद्दे पर यहां की सरजमी और सियासत दोनो का पारा सातवें आसमान पर है ।  पहले पड़ोसी जिले और अब जशपुर में पत्थरगाड़ी के नाम से मशहूर हो रहे इस आंदोलन का मकसद जो भी हो लेकिन इस आंदोलन के शुरुआती दौर में ही दो वर्गों के बीच  दीवार   जरूर खड़ा हो गया है ।

 

पत्थरगाडी की भनक कुछ दिन पहले ही लग गई थी ।और जब यह मामला सुर्खियों में आ गया तो दो वर्ग आमने सामने खड़ा हो गया है । पांचवीं अनुसूची कानून को पूर्णतः लागू करने की मांग के पक्षधर आदिवासी संगठन के लोग अब खुलकर इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गए हैं वही सत्ता पक्ष से जुड़े लोग और कई बुद्धिजीवी इसे विघटनकारी आंदोलन बताकर प्रशासनिक हस्तक्षेप की बात कर रहे है । 3 दिन पहले जिले के कई ग्रामीणों ने बग़ीचा एसडीएम से पत्थरगाडी आंदोलन पर रोक लगाने की मांग की थी ।एसडीएम को दिए गए एक ज्ञापन में ग्रामीणों ने बताया है कि इस आंदोलन के जरिये समाज मे अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है । इसके अगले ही दिन भाजयूमो प्रदेशाध्यक्ष प्रबल प्रताप जूदेव ने भी इस आंदोलन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और पत्थरगाडी आंदोलन को संचालित करने वाले नेताओं की एक हप्ते में पत्थर उखाड़ने का अल्टीमेटम दे दिया । बात तब और बढ़ गई जब प्रबल जूदेव के अल्टीमेटम को चाईलेंज करते हुए रविवार को बगीचा के बछरांव में कई गांव के लोगो ने मिलकर बड़े ही धूम धाम से पत्थरगाड़कर आदिवासी हुकूमत का एलान कर दिया । तीर कमान से लैश सैंकड़ो आदिवासियों ने जिले में आदिवासी सत्ता कायम करने की आवाज बुलंद कर दी ।

        बछरांव में गाड़े गए विवादित शिलालेख पर प्रशासन का कोई भी स्टंट अभी तक खुलकर सामने नही आ पाया है ।सूत्र बताते है कि प्रशासन जानकारों की मदद लेकर पांचवीं अनुसूची कानून का बारिकी से अध्यन कर रहाहै । इसके बाद ही प्रशासन इस मामले में अपना रुख साफ कर पाएगा ।

 

इधर बछरांव के ताजा मामले पर अब तक किसी भी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया सामने नही आई है । भाजपा हो या काँग्रेस इस मामले में कुछ भी बोलकर किसी एक वर्ग से पंगा लेने की स्थिति में नही दिख रहे हैं । आदिवासी बनाम गैरआदिवासी के झंझट में पडने से दोनों पार्टियां फिलहाल बचती दिख रही है  लेकिन यहां अब बात केवल सियासत की नही रह गयी है बात जिले की शांत फिजा में जहर घोलने से रोकने की है और इस मसले पर सियासत से ऊपर उठकर सोंचे बगैर समाधान की गुंजाइश बनती नही दिख रही है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *