Saturday, September 22, 2018
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मेक इन इंडिया:अब तक केवल 6 कुम्हारों को ही मिल पाया इलेक्ट्रॉनिक चाक,

 

 

धर्मेंद्र सिंह

 

दीप पर्व यानि की दिपावली का नाम जहन में आते ही दीपों की मध्म लो से गुलजार होते घर-आंगन की आकर्षक मनमोह लेने वाले दृष्य अंतरमन से सामने आती है। दीपों के बिना दीप पर्व की कल्पना भी नहीं किया जाता सकता है। दीपों को बनाने वाले कुम्हारों की हालत दैनिय है, दिपावली एवं गर्मी के शुरूवात में थोडे़ बहुत मिट्टी के बर्तन बिकते है, और बाकि सीजन कुछ काम नहीं होता है ना ही स्थानीय बाजारों में खपत रहती है, अगर हमें पूरा साल अच्छा काम मिलता और बाजार में खपत होगी, तो हमारी आमदनी बढे़गी। अभी कुछ खास आमदनी नहीं होती है। पूर्वजों से चला आ रहा काम है, इसे परम्परा की तरह निभाते हुए करते आ रहे है।

ठण्डे बसते में मेकिंन इंडिया

मैकिन इंडिया का नारा बुलंद हो रहा लेकिन स्थानीय स्तर में जो कलाकार है उने प्रोसाहित एव ंउनके काला को विकसीत करने के लिए प्रशासन रूची नहीं ले रहा है। अगर इन्हीं कुम्हारों को अच्छी प्रशिक्षण के साथ इन लोगों के लिए स्थानीय स्तर में बाजार उपलब्ध कराये तो इन लोगों की जिंदगी में बदलाव आयेगा। वहीं प्रशासन अब तक कौशिल विकास केन्द्र में करोड़ों बाह कर युवा को रोजगार के के लायक बनाया गया। लेकिन सही इनमें से हजारों युवा प्रशिक्षण लिया, लेकिन प्रशिक्षण के बाद एक प्रतिशत ही युवा को रोजगार उपलब्ध हो पाया है।वही दूसरे प्रदेशों में कुल्हड, मिट्टी के गिलस आदि का निर्माण होता है चाय, लसी एवं अन्य खाद्य साम्रगी परोसा जाता हैं एक बार उपयोग के बाद मिट्टी के इस बर्तन को तोड दिया जाता है। अगर इसी तरज में अगर स्थनीय बाजार मंे इन कुम्हारों को भी रोजगार उपलब्ध कराये तो इनके जीवन में भी सुधार हो सकता हैं।
कुम्हार कोठा का प्रस्तावित अधर में

एक साल पूर्व कुम्हार कोठा के लिए तात्कालीन कलेक्टर के द्वारा कुम्हाररास में पांच एक जमीन चयन किया गया था। जिससे में कुम्हारों को और बेहतर प्रशिक्षण देकर इनकों पारंगत करने का प्रयास था। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी कुम्हार कोठा के निर्माण भी ठण्डे बसे में चला गया है। जिसमें कुम्हारों को साल भर मिट्टी के आकर्षक वस्तुओं का निर्माण कर सके। जिनके लिए कुल 13 कुम्हार कोठा का निर्माण होना है।

 

मात्र छह लोगों को मिला चाक मशीन

वही कुम्हारों की बस्ती में कुम्हाररास वार्ड क्रमांक 15 में लगभग 60 घरों के लोग मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते है, और मात्र इतने लोगों में से मात्र छह लोगों को ही करेंट से चलने वाली चाक मशीन ही दिया गया। यह मशीन को जगदलपुर जाकर कुम्हार स्वयं के खर्च से लेकर आये। वही कुम्हारों ने बताया कि एक साल पूर्व जगदलपुर से आकर दो लोग फार्म भर कर ले गये है।

कुम्हार मंगीराम, उम्र 60 वर्ष, ने बताया कि करेंट से चाने वाली चाक मशीन मेरा भतीजा का है जो बीमार होने के कारण उसका मशीन लेकर मै काम कर रहा हॅू इसे काम करने में आसानी होती हैं। पारम्परिक चाक से बाने पर बहुत ताक लगता है। अब उम्र ढल चूका है परानी चाक से बना मुश्किल होता है। करेंट वाली चाक के लिए जगदलपुर से आये दो लोगों को फार्म भर कर लेकर गये है कब मिलेगा क्या पता है।
मंगीराम ने बताया कि कलेक्टर ने पांच जमीन देकर कुम्हार कोठा बनाने दिया है पटवारी लोग आकर जमीन का सीमाकंन किया गया हैं पता नहीं कब बनेगा। मंगीराम ने बताया कि जब से होश संभाला तब से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम कर रहा हॅॅू। साल में 20 से 25 हजार कमा लेते है वही दिवाली के सीजन में चार से पांच हजार के दीये बिक जाते है, साथ ही खेती किसानी काम करते है, जिसके साहरे जिंदगी गुजारा करने लायक आमदनी हो जाती है। वही आज के बच्चे इस काम से दूरी बना रहे है तो आने वाले दिनों इस काम करने वाले कुछ ही लोग रहे जायेगे।

कुम्हार सोमारू ने बताया कि अभी पारम्परिक चाक के ही मिट्टी के बर्तन बना रहे है, इसमें काफी ज्यादा महेनत लगता है। करंेट चाक मशीन के लिए एक साल पहले ही आवेदन भर कर ले गये है। अभी तक नहीं मिला। वही दिवाली के समय तीन-चार हजार की दीयों की बिक्री हो जाती है।

श्रीमती सनमती ने बताया कि मेरे पति शनिराम मिट्टी के बर्तन चाक के साहरे बनाते हैं। सुबह के समय दीये बनाये और दो पहर के में गायों को चराने गये है। मुझें चाक चलना मुश्किल होता है तो मै हाथों से दीये बना रही हॅू, साल भर पहले करेंट वाला चाक मशीन के लिए आवेदन दिया है लेकिन नहीं मिला है।

कुम्हार मंगन ने बताया कि चाक मशीन के लिए आवेदन दिये है। लेकिन एक साल हो चूक है, लेकिन नहीं मिला नहीं हैं। पूराना चाक से ही मिट्टी के बर्तन बना रहे है। दिवाली के लिए दो तीन हजार बिकने लायक ही दिये बनाया हूॅ। इससे गुजार नहीं चलता है साथ में खेती किसानी काम कर जिंदगी चलाने लायक आमदनी हो जाती है।

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