Tuesday, June 19, 2018
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कल किसान सरकार के खिलाफ संघर्ष का करेंगे शंखनाद, कल सम्मलेन के नाम पर होगा जुटान

 

रायपुर मुनादी ।

संपूर्ण कर्ज माफ़ी, स्वामीनाथन आयोग की प्रमुख सिफारिशों के अनुसार लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य, हर साल धान का 300 रूपये बोनस, भू-राजस्व संहिता में किए गए सभी आदिवासी विरोधी संशोधनों को रद्द कर जबरन भूमि अधिग्रहण को बंद करने, पांचवी अनुसूची, पेसा और वनाधिकार मान्यता कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा मनरेगा में 250 दिन काम, 250 रूपये रोजी दिए जाने और इन मांगों पर पूरे प्रदेश में साझा आंदोलन विकसित करने के उद्देश्य से कल 8 जनवरी 2017 को गांधी मैदान, रायपुर में एक दिवसीय किसान संकल्प सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा हैं l इस सम्मलेन में पूरे प्रदेश से आये किसानों को देश के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक देविंदर शर्मा, भूमि अधिकार आंदोलन के नेता और किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव हन्नान मोल्ला, स्वराज आंदोलन के नेता योगेन्द्र यादव व पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरविन्द नेताम संबोधित करेंगे.

पूरे देश में किसान और किसानी संकट में है और छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं है, जहां एनसीआरबी के ही अनुसार हर एक लाख किसान परिवारों में 40-50 आत्महत्याएं हर साल हो रही है. छत्तीसगढ़ में भाजपा राज के 14 वर्षों में 25000 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं और इसका प्रमुख कारण लाभकारी समर्थन मूल्य न मिलना, फसल के नुकसान होने पर कोई पर्याप्त राहत न मिलना और इस कारण उनका कर्जे में डूबा रहना है. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने से इस सरकार ने इंकार कर दिया है और इस साल बोनस की घोषणा भी मात्र ‘चुनावी छलावा’ है. छत्तीसगढ़ गंभीर सूखे की स्थिति से गुजर रहा है, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार ने कोई राहत नहीं दी है और राज्य सरकार किसानों और गांवों के नाम पर पूरा खजाना उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट कंपनियों को ही लुटा रही है. मनरेगा के जरिये सूखे से लड़ा जा सकता था, लेकिन यह सरकार मनरेगा तक में ग्रामीणों को काम नहीं दे रही है, जबकि केन्द्र तो हर साल इसके बजट में ही भारी कटौती कर रहा है.

रबी मौसम में धान की फसल को पानी न देने के जरिये प्रतिबंधित करने से यह स्पष्ट है कि जल जैसी प्राकृतिक संपदा का उपयोग भी पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए यह सरकार करना चाहती है. 5वीं अनुसूची, पेसा कानून और आदिवासी वनाधिकार कानूनों की पहले ही यहां धज्जियां उड़ाई जा रही है और ‘विकास’ के नाम पर जंगल व जमीन से आदिवासियों और गरीब किसानों को बिना पुनर्वास, बिना पुनर्व्यवस्थापन उजाड़ा जा रहा है. बस्तर से लेकर सरगुजा तक खनन, बांध, रेल और उद्योग से अपनी जमीन को बचाने की और विस्थापन से बचने की लड़ाई आदिवासी और ग्रामीणजन मिलकर लड़ रहे है.

यह पहला मौका नहीं है, जब भाजपा सरकार ने आदिवासियों की जमीन ‘विकास’ के नाम पर हड़पने के उद्देश्य से भू-राजस्व संहिता में संशोधन किया है ‘सहमति’ से आदिवासियों की जमीन लेने का प्रावधान किया गया है. इसके पहले भी केंद्र सरकार के ईशारे पर भूमि अधिग्रहण कानून से जुड़े नियम-कायदों को शिथिल किया गया है और वास्तव में कॉर्पोरेट घरानों के लिए भूमि की लूट को आसान बनाया है. डेढ़ साल पहले भू-राजस्व संहिता की धारा-172 में किए गए संशोधन के बाद अब गैर-योजना क्षेत्र में औद्योगिक प्रयोजन के लिए कृषि भूमि के डायवर्सन की जरूरत ही नहीं रह गई है और किसानों को चारागाह, गोठान आदि निस्तार या अन्य सरकारी जमीन भी संबंधित उद्योग/कंपनियों को देना पड़ेगा. पुनर्वास व पुनर्व्यवस्थापन के प्रावधान लागू करने के लिए निर्धारित 10 एकड़ की सीमा बढ़ाकर 1000 एकड़ कर दी गई है और इस प्रकार पुनर्वास की जिम्मेदारी से ही कार्पोरेटों को बरी कर दिया गया है. टाटा की वापसी के बाद भी बस्तर में आदिवासियों से ली गई जमीन लौटने से यह सरकार इंकार कर रही है, जबकि भू-अधिग्रहण कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान है. यह स्पष्ट है कि किसानों के संसाधनों की लूट में भाजपा सरकार पूंजीपतियों और कार्पोरेटों के एक एजेंट की तरह काम कर रही है.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बैनर तले किसानों, आदिवासियों, दलितों के बीच उनके अधिकारों के लिए काम करने वाले छोटे-बड़े सभी 25 से ज्यादा संगठन एकजुट होकर इन नीतियों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद करने जा रहे हैं. इस सम्मलेन में आगामी दिनों में प्रदेशव्यापी साझा आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार की जायेगी.

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