Saturday, September 22, 2018
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जब एक पुलिस अधिकारी ने फेसबुक पर लिखी अपनी लवस्टोरी, फिर तो…..पढ़कर देखिए

बिलासपुर मुनादी

 

लव स्टोरी तो सबकी होती है, पर सुननेवाला कोई नहीं होता, लेकिन यदि कोई विशेष व्यक्ति सुनाये तो लोग उस स्टोरी में खुद को फिट करते हैं. ये बात अगर सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर हो तो हर कोई खुद में प्रेम ग्रन्थ बन जाता है. जब बिलासपुर के एक पुलिस अधिकारी  अभिषेक सिंह, डीएसपी बिलासपुर ने अपनी बचपन की प्रेम कहानी फेस बुक पर लिखी तो शुरू हो गयी लाइक्स और कमेंट की बारिश. आप पढ़िए शायद यह आपके दिल को भी छू जाय.

पापा बेगूसराय (बिहार) में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट थे .. वहाँ रेलवे स्टेशन के बगल में ऑफिसर्स कॉलोनी थी,वहीं पर DM, SP सारे अधिकारी रहते थे .. जिस स्कूल में मैं पढ़ता था। जो बरौनी रिफाइनरी टाउनशिप के अंदर था । जैसा फिल्मों में या TV serials में दिखाते हैं ना .. वैसा ही एकदम । उसी कॉलोनी में 1 और मजिस्ट्रेट अंकल थे,उनकी 3 बेटियाँ थीं .. बड़ी वाली मुझसे बड़ी,मझली वाली मेरे हम उम्र और छोटी वाली मुझसे छोटी .. मझली वाली मुझे बहुत अच्छी लगती,गोरी सी,थोड़ी हेल्थी सी मुझे पतली-दुबली लड़कियाँ ज्यादा पसंद नहीं , उसे भी शायद मैं अच्छा लगता था,उसकी मुस्कुराहट से तो ऐसा ही लगता था । कॉलोनी के बीचोबीच 1 तालाब था,पक्का तालाब .. सीढ़ियाँ, तालाब के बीचोबीच जाता 1 पुल .. चारों तरफ eucalyptus के पेड़ और बेंचेज़ .. शाम के वक़्त डूबते हुए सूरज की रौशनी में बहुत खूबसूरत लगता था ।

उस वक़्त मैं 7वीं में पढ़ता था और wo भी उस क्लास में मगर दूसरे स्कूल में .. शाम को आने के बाद कपड़े बदल कर, “स्वाभिमान” सीरियल देखते हुए (उसकी हीरोइन का भी नाम था और हीरो का ऋषभ”) खाना खा कर क्रिकेट खेलने जाता था और क्रिकेट खेलने के बाद सीधा साईकल चलाने .. तालाब के चारों ओर । साथ मे वो भी चलाती थी,पूरे रास्ते कुछ ना बोलना बस गोल गोल साईकल चलाना और एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराना . एक बार उसके साईकल की चैन उतर गई और मेरे दिल का चैन खो गया। बहुत कोशिश की उसने बनाने की मगर अफ़सोस.. फिर मैं अपनी साईकल से उतरा और उसकी चैन बनाई,उसने बिना नज़रें मिलाए “थैंक यू” बोला … उसके ये 2 सिंपल वर्ड्स उन 3 मैजिकल वर्ड्स पर भारी थे । घर गया तो काफी शाम हो चुकी थी,मेरी मम्मी शालिनी सिंह जी ने गुस्से में कहा ” इतनी देर तक खेलोगे तो क्या करोगे जिंदगी में ?” पापा ने दूर से धीरे से बोला-” साईकल दुकान खोलेगा” ? उन्होंने शायद मुझे उस वक़्त देख लिया था मैं कुछ ना बोला चुपचाप मुस्कुराते हुए पढ़ने लगा,सबसे मजेदार बात ये कि उस टाइम मेरे मार्क्स भी बहुत अच्छे आते थे .. प्यार में बहुत ताकत होती है मैंने जान लिया था 😉

खैर,सिलसिला यूँ ही चलता रहा फिर आया 14th february .. मुझे कद्दू नहीं मालूम था इसका मतलब,उस टाइम बजरंग दल वाले भी इतने “जागरूक” नहीं थे 😉 मैं गया क्रिकेट खेलने,कपड़े गन्दे हो गए थे तो घर चला गया बदलने .. वहाँ मम्मी जी बैठी मुस्कुरा रही थीं,मैंने कारण पूछा तो उन्होंने ग्रीटिंग कार्ड थमा दिया,उस टाइम ग्रीटिंग कार्ड्स चलते थे,whatsapp-फेसबुक टाइप फ्री वाले नहीं 😉 उस वक़्त Archie’s एक बड़ा ब्रांड था .. खैर,जब लिफाफा खोला तो ऊपर लिखा था Happy Valentine’s Day SWEETHEART । दुनिया भर के दिल,गुलाब बने पड़े थे उस पर .. अंदर सिर्फ To you..उसके बाद दुनिया भर के रोमांटिक मैसेजेस और लास्ट में “……..” ..मैं तो खुशी से झूमने लगा था ..मम्मी मेरा बचपना देख कर मुस्कुरा रही थीं.. मैंने चुपके से कार्ड को शर्ट के अंदर छुपाया और ले जाकर दोस्तों को दिखाया .. उन सब के लिए तो मैं कैसानोवा बन गया था 😉 मेरा नाम भी “ऋषभ” रख दिया गया था (वो स्वाभिमान का हीरो,हाँ हाँ वही 😉 ) अगले दिन जब स्कूल जा रहा था रिक्शे से तो वो अपने घर के बाहर खड़ी थी और चुपके से टाटा कर रही थी।  स्कूल में भी दोस्तों को दिखाया,  मुझे लगने लगा था कि साईकल की चैन बनाने से इतना प्यार हो गया उसे मुझसे तो मुझे मेकैनिक ही बन जाना चाहिए,  फिर शाम को मैं भी पहुँचा archies की शॉप पर और एक बहुत ही खूबसूरत से valentine कार्ड खरीद कर,उसकी छोटी बहन को घूस देकर उसके पास पहुँचाया । ये सिलसिला चलता रहा,क्लास में टॉप भी कर गया उस साल .. प्यार की ताकत बाबू भैया,प्यार की ताकत ;

अगले साल उसका एडमिशन नवोदय विद्यालय, हज़ारीबाग में हो गया,वो जाने वाली थी । मेरे ऊपर तो मानों गम का पहाड़ टूट पड़ा था !! वो चली भी गयी,जब वो जा रही थी तो उसके घर के बाहर ही खड़ा था उदास चेहरा लिए,वो भी 🙁 ना पढ़ाई में मन लगे ना खेलने में,यूनिट टेस्ट में ले दे कर पास हुआ .. घर पर डाँट भी पड़ी मगर किसी को मेरा दर्द ना दिखा, खैर उसकी बड़ी बहन की दोस्त मेरे दोस्त की दोस्त थीं उन्हें किसी तरह पटाया कि दीदी उसका एड्रेस पता कर दो,उन्होंने किया भी बहुत सी डिमांड पूरी करने के बाद ..फिर एक अंतर्देशीय लाया .. अंतर्देशीय नीले रंग का आता था वो खुद ही मुड़ कर लिफाफे टाइप बन जाता था,उस पर अपने दिल को फाड़ कर रख दिया, “लिखते हैं खत खून से स्याही ना समझना टाइप” ।2-4 शायरियाँ मम्मी की गृहशोभा,सरिता से चुरा कर भर दी गईं थीं .. उसे अपने गद्दे के नीचे रख कर स्कूल गया, सोचा आने के बाद पोस्ट बॉक्स में डाल दूँगा मगर .. वो लग गया मम्मी जी के हाथों में .. उन्होंने ने पूरा पढ़ा उसके बाद बोला ” ये सब क्या है ?” मैंने उनसे लेकर दुखी आवाज में कहा , आप नहीं समझेंगी। उसके बाद जो बाएं हाथ से पढ़ना शुरू हुआ, वो आज भी जब ठंढ में अपनी आफिस की कुर्सीपर बैठता हूँ तो याद आ जाता है।

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