Wednesday, June 26, 2019
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बिसलरी से गुड़ाखू करने वाले चुनावी कार्यकर्ताओं को इस बार पानी पाउच भी नसीब नहीं …जानिए कैसे

कोरिया से अनूप बड़ेरिया की मुनादी

चुनाव आयोग के कड़े रुख को देखते हुए ऐसा लग रहा कि वह दिन अब लद गए जब चुनाव को लोग त्यौहार के रूप में देखते थे। चुनाव की घंटी बजते ही जहां कार्यकर्ता खुश हो जाते थे, और सज धज कर ऐसे तैयार हो जाते थे, मानो जैसे बारात जाना हो। जो कार्यकर्ता पूरा जीवन हैंडपंप का पानी पीता है, चुनावी त्यौहार में वह गुड़ाखू भी बिसलरी याने मिनरल वाटर से करता था। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने जिस तरह का कड़ा रुख अपनाया है, उससे ऐसा लग रहा है, कि इन चुनावी कार्यकर्ताओं को बिसलरी तो दूर इस बार पानी पाउच भी नसीब हो जाए तो बहुत है। हालत तो यह है कि जरूरत से ज्यादा कड़ाई होने की वजह से इस बार शहर हो या गांव कहीं भी बैनर या झंडे नजर नहीं आ रहे हैं।

नहीं तो इसके पहले के चुनावों में शहर तो शहर पूरे गांव को झंडों से पाट दिए जाता था, जिससे गांव में घुसते ही पहले से आंकलन हो जाता था, कि यहां किस पार्टी का प्रभाव ज्यादा है। लेकिन इस बार परमिशन का इतना ज्यादा भय है कि पार्टी के कार्यकर्ता अपने घर में खुद झंडा नहीं लगा पा रहे हैं। यही नहीं प्रमुख राजनीतिक दल चाहे कांग्रेस हो या भाजपा इनके कार्यालयों में सुबह से ही ऐसी भीड़ लगती थी, मानो शादी घर हो। सुबह से ही पूड़ी- सब्जी या पोहा-जलेबी के साथ चाय का इंतजाम रहता था और वाहनों का रेला नजर आता था , जैसे बरातियों की विदाई की जाती है, वैसे ही कार्यकर्ताओं को उनका गंतव्य बता कर बकायदा सम्मान राशि के साथ रवाना किया जाता था। शादी में रूठे फूफा की तरह एक-एक कार्यकर्ता को मनाया जाता था और उसकी मांगे पूरी की जाती थी। लेकिन इस बार दोनों ही कार्यालय में बारात का नजारा नदारद है।

चुनावी कार्यकर्ता भी एक दूसरे का मुंह देखकर आंखों ही आंखों में इशारे से पूछ रहे हैं कुछ मिला क्या, या कब तक मिलेगा। हालत तो यह है कि नाराज फूफा को मनाना तो दूर कोई देख भी नहीं रहा है। पिछले पंचवर्षीय डीजल पेट्रोल की पर्चियां इतनी बंट जाती थी कि कार्यकर्ता अपनी गाड़ी के साथ-साथ अपने रिश्तेदारों व पड़ोसियों की गाड़ी में भी तेल डलवा कर वाहवाही लूट लेता था । लेकिन ग़ालिब बदहाली का आलम तो इतना है कि इस चुनावी तिहार में पेट्रोल डीजल वाला तेल तो छोड़िए कार्यालय पहुंचने के बाद शरीर में चिपुड़ने वाला सरसों तेल भी नसीब नहीं हो रहा। जिन कार्यकर्ताओं की जेबें रोजाना लाल, हरे, नीले, पीले नोटों से भरी रहती थी। अब उन्हें वीकली ₹50 भी बामशक्कत मिल पा रहे हैं। इसलिए कार्यकर्ता भी अब खुले तौर से साफ कह रहे हैं कि “अब तक नहीं मिला पैसा तो फिर चुनाव कैसा” ! चुनावी कार्यकर्ताओं से तो ज्यादा मतदाताओं का दर्द ए दिल गुजर रहा है। अब तक मतदान की तिथि के पहले उन्हें कम से कम दो से तीन बार बकरा भात की पार्टी मिल चुकी रहती थी, यही नहीं एक दो राउंड शराब की खेप भी पहुंच जाती थी। लेकिन हाय रे चुनाव आयोग की बद्दुआ इन मतदाताओं को अभी तक दारू का दा और बकरा का बा भी नसीब नहीं हुआ है। यही हाल अगर चुनाव आयोग का रहा तो आने वाले समय में चुनावी तिहार जैसा सार्वजनिक व महान पर्व विलुप्त हो जाएगा और इसकी स्मृतियां इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेगी। अगर चुनाव आयोग का डंडा इसी प्रकार चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब कार्यकर्ता और मतदाता चुनाव आयोग के खिलाफ बिगुल फूंक कर धरना प्रदर्शन करने को मजबूर हो जाएंगे।

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